जैश-ए-मोहम्मद का आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार जिसने कि 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला किया था। वह खुफिया एजेंसी की लिस्ट में सी श्रेणी का आतंकवादी था। यानी उसे बहुत कम घातक माना गया था। उसके आतंकवाद रोधी एजेंसियों के रडार से बाहर होने का सबसे बड़ा कारण मानवीय गुप्त सूचना का कमजोर होना था। पिछले पांच सालों में देसी मुखबिरों पर पाकिस्तान ने कई आक्रामक हमले किए हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार आधिकारिक दस्तावेजों में डार को आतंकवादियों की सूची में बेहद कम खतरनाक के तौर पर रखा गया था। दिसंबर 2018 को अपडेट किए गए डाटाबेस से पता चला है कि कामरान और फरहान की उपस्थिति के बारे में कोई सूचना नहीं थी। दोनों पाकिस्तानी जैश के कमांडर्स थे और उन्हें सोमवार को सुरक्षाबलों ने पुलवामा में हुई मुठभेड़ में मार गिराया था।
जैश कमांडरों के मामले में सुरक्षाबल उनकी पहचान को लेकर संघर्ष कर रहे थे क्योंकि उनके बारे में कोई खुफिया जानकारी नहीं थी। आतंकवाद रोधी एक अधिकारी ने कहा, 'हम उनकी असली पहचान को लेकर अस्पष्ट थे क्योंकि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई आतंकी अभियानों के लिए उनके कोड नाम रखती है।
आईएसआई हर आतंकी को जानबूझकर कई उपनाम देती है जिससे कि हमें गुमराह किया जा सके। वह अमूमन अबु, गाजी आदि उपनामों का इस्तेमाल करती है जिससे कि उलझन पैदा हो सके। यही वजह है कि हमें नहीं पता था कि अब्दुल राशिद गाजी नाम का कोई आतंकी है जो कथित तौर पर आईईडी विशेषज्ञ है और उसने आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार को प्रशिक्षित किया था।'
सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों ने इस बात को स्वीकार किया कि 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने कश्मीर के स्थानीय लोगों के खिलाफ एक अभियान शुरू किया है। पिछले तीन सालों के दौरान पाकिस्तानी आतंकियों ने 180 नागरिकों की हत्या कर दी है। जिसमें से कुछ मुखबिर थे। हालांकि अधिकारियों ने यह बताने से इनकार कर दिया कि मारे गए लोगों में से कितने मुखबिर थे।
एक सूत्र ने कहा, 'लेकिन इसने जमीन पर गुप्त सूचना को कमजोर करने का काम किया।' खुफिया एजेंसियों ने बताया कि साल 2018 में 140 आतंकी घाटी में आए थे और इतनी ही संख्या में स्थानीय नागरिक आतंकी संगठन में शामिल हुए थे। पिछले साल सुरक्षाबलों ने 240 आतंकियों को मार गिराया था। इसके बावजूद घाटी में मौजूद आतंकियों की संख्या 300 के लगभग है।