राष्ट्रीय संस्थानों में गांधी की प्रतिमा ही क्यों?
जब उनसे पूछा गया था कि लेकिन उस खाली जगह के लिए सड़कों, पार्कों या फिर राष्ट्रीय संस्थानों के परिसरों में उनकी प्रतिमा ही क्यों? अगर हमारे दिल में गांधी नहीं हों, तो बाहर बनी उनकी प्रतिमा हमारी कितनी मदद कर सकती है। उन्होंने कहा था "बिल्कुल मदद कर सकती है," सुतार इस सवाल का जवाब बच्चों की तरह देते-"अगर कोई बच्चा सड़क पर जा रहा है और वहीं किसी चौराहे पर गांधी जी की कोई प्रतिमा लगी हुई है, तो वह अपनी मम्मी या पापा या बड़े भाई से पूछेगा कि वह क्या है। किसकी मूर्ती है, क्यों है। जवाब में वह गांधीजी का नाम सुनेगा। उसे जिज्ञासा होगी। बचपन की बात दिल के कोने में बैठी रहती है। बड़ा होगा तो खुद गांधी के बारे में जानने-समझने की कोशिश करेगा। किसी प्रतिमा के माध्यम से हम, जिनकी प्रतिमा है, उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाते हैं, उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करते हैं।"
लेकिन ये प्रासंगिकता है क्या? ध्यान से देखने पर प्रासंगिकता शब्द में समय की गंध मिलती है। कोई भी कलाकृति, शिल्प, दर्शन और विचार की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करती है कि आज का जो वक्त है, आज जो हम हैं, उसे वह कितना प्रभावित कर सकती है। सच है कि गांधी की प्रासंगिकता को लेकर हम लगातार बहस करते रहते हैं। गांधीजी ने कहा था-"खुद पर विश्वास करें और इससे आप विश्व को हिला सकते हैं। मनुष्य अक्सर वही बनता है, जिस पर उसे विश्वास होता है। अगर पहले ही यह विश्वास हो जाए कि मैं यह काम नहीं कर पाऊंगा तो इससे आपका आत्मविश्वास कम हो जाएगा, लेकिन जैसे ही आपको विश्वास होगा कि आप यह काम कर लेंगे तो आप उस काम में सफल हो जाएंगे।"
पिछले 100 साल में कम ही लोग ऐसे हैं, जिन्हें गांधी जितनी ख्याति मिली। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बापू को तारीख में बांध पाना असंभव है। वे अपने समय में भी प्रासंगिक थे, और आज भी हैं। उनकी प्रासंगिकता को सुतारजी कुछ अलग ढंग से समझाते थे-"हम कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएं, गांधी को नकार पाना समय के बस में भी नहीं दिखता। हालांकि जो लोग गांधी की राह पर चलते हैं, वे कभी यह दावा नहीं करते कि मैं उनकी बताई राह पर चलता हूं। जिनको गांधी की समझ नहीं है, वही ऐसा दावा करते हैं।"
गांधी के एक वाक्य से सुतार पूरा दर्शन सामने रख देते थे
गांधी मार्ग की अवधारणाएं समाज में इतनी उलझ चुकीं है कि उसे आज की भागदौड़ में सुलझा पाना शायद ही संभव हो। लेकिन गांधी के एक वाक्य से सुतार पूरा दर्शन सामने रख देते थे-"दुनिया में ऐसे लोग हैं जो इतने भूखे हैं कि भगवान उन्हें किसी और रूप में नहीं दिख सकता सिवाय रोटी के रूप में।" ये रोटी बड़ी जरूरी चीज है। दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिनके लिए धरती से ज्यादा बड़ी होती है रोटी की गोलाई। गांधीजी समानता की बात करते थे। भूख मिटाने की बात करते थे। प्यार और सद्भाव की बात करते थे। बातें उनकी अब भी सुनी, बोली और पढ़ी जा रही हैं। सुतार जी कहते थे, "विदेशों में भी उनके मतों को मानने वाले लाखों की तादाद में हैं। वे भी गांधी चाहते हैं। उनको भी हमने बनाकर दिया है। लगभग 350 से ज्यादा बड़े मूर्तिशिल्प तो विदेशों में मैंने बनाए हैं। देश में हजारों। आप गांधी की प्रतिमा को एक निर्जीव मूर्ति की तरह कभी न देखें। मन में विचार हो तो वह प्रतिमा आपसे बातें करेंगी।"
ठीक वैसे ही, जैसे गांधी बनाते हुए सुतार जी खुद से बातें करते थे। लगभग छह दशक की कलायात्रा में इन्हें हर मोड़ पर गांधी मिले। कला के वाद पर भरोसा करने वालों ने इन्हें रीयलिस्टिक कलाकार बताकर आधुनिक मानने से भले ही इनकार कर दिया हो, लेकिन इन्हें कोई शिकायत नहीं थी। कोई परवाह भी नहीं थी।