प्लास्टिक की बोतल में सालों साल दवा रखी रहती है। आप और हम उसका इस्तेमाल करते हैं, लेकिन प्लास्टिक बोतल से कुछ ऐसे विषाक्त पदार्थ निकलते हैं जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होते हैं। दवा रखने के लिए जिस प्लास्टिक बोतल का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह कितना विषाक्त है इसका वैज्ञानिक अध्ययन करने का निर्णय लिया गया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) को अध्ययन की जिम्मेदारी दी गई है। दरअसल इस संबंध में बनाई गई पूर्व कमेटी ने इस मामले में विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराने की बात कही थी।
प्लास्टिक बोतल से निकलने वाले विषाक्त पदार्थ की वजह से उसमें रखी दवा किस हद तक खतरनाक हो सकती है इसकी जांच के लिए आईसीएमआर ने अपनी संस्था इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशियन (एनआईएन) को जिम्मेदारी सौंपी है। अध्ययन के दौरान सभी मेट्रो शहरों से 1000-1000 प्लास्टिक की बोतलों को इकट्ठा किया जाएगा। इसके बाद इन बोतलों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले तत्व की अलग-अलग प्रयोगशालाओं में पड़ताल की जाएगी।
आईसीएमआर इन बोतलों में इस्तेमाल होने वाले तत्वों की जांच एक साथ दो प्रयोगशालाओं में करेगी। दोनों लैब से अलग-अलग परिणाम आने पर तीसरी लैब में जांच होगी। जांच से इस बात का पता लगेगा कि बोतल निर्माण में कौन से ऐसे तत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं। इससे पहले बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग के पूर्व सचिव डॉ. एमके भान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी थी, जिसने कहा था कि इस मामले में और अधिक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है।
प्लास्टिक बोतल के लिए दिशा-निर्देश
केंद्र सरकार की ओर से एम्स फार्माकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. वाईके गुप्ता की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है, जो प्लास्टिक बोतल के संबंध में दिशा-निर्देश तैयार करेगी। कमेटी यह तय करेगी कि दवा के रख-रखाव के लिए इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बोतल में कौन-कौन से तत्व और कितनी मात्रा में होनी चाहिए। डॉ. गुप्ता ने बताया कि अगले माह तक कमेटी की ओर से प्लास्टिक की बोतल के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश तय कर दी जाएगी।