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West Bengal: सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी दो लोगों की उम्रकैद की सजा, काला जादू के शक में की थी महिला की हत्या

Wed, 13 Sep 2023 10:52 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

West Bengal: उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में 1993 में जादू-टोना करने के आरोप में एक महिला की हत्या के मामले में दो लोगों की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में 1993 में जादू-टोना करने के आरोप में एक महिला की हत्या के मामले में दो लोगों की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ठोस सबूतों को देखने के बाद और गवाहों की गवाही और पेश किए गए दस्तावेजी सबूतों में कोई विशेष कमी न होने के कारण उसकी राय है कि निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराने और सजा सुनाने में कोई गलती नहीं की है।

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न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि और सजा की सही पुष्टि की है। शीर्ष अदालत उच्च न्यायालय के जुलाई 2010 के फैसले के खिलाफ भक्तु गोरैन और बंधु गोरैन की अपील पर सुनवाई कर रही थी।

पीठ ने मंगलवार को दिए अपने फैसले में कहा,'ठोस सबूतों के आलोक में और गवाहों की गवाही और दस्तावेजी सबूतों में कोई विशेष कमी न होने के कारण हमारी राय है कि निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराने और उम्रकैद की सजा सुनाने में कोई गलती नहीं की।'
 

पीठ ने दोनों अपीलकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील के इस दावे पर विचार किया कि मृतक महिला की हत्या करने का उनका कभी भी साझा इरादा नहीं था और वे उसे भविष्य में जादू-टोने में शामिल होने से रोकने के लिए बस उसे सबक सिखाना चाहते थे। पीठ ने कहा, 'इस दलील में कोई दम नहीं है क्योंकि माना जा सकता है कि पिछली रात दोनों पक्षों के बीच विवाद हुआ था, जिसमें सभी पांच आरोपी मौजूद थे और इसी झगड़े को आगे बढ़ाते हुए वे सभी बदले की भावना से सुबह पेश हुए थे।'
 

अदालत ने कहा कि तथ्य यह है कि आरोपी अगली सुबह इकट्ठा हुए थे और पीड़िता को घातक हथियारों से घेर लिया था, यह निष्कर्ष निकालने के लिए 'पर्याप्त संकेत' है कि उन्होंने पूर्व नियोजित तरीके से ऐसा किया। पीठ ने कहा, 'इस प्रकार इस दलील को पूरी तरह खारिज किया जाता है कि उनका कोई साझा इरादा नहीं था।'

पीठ ने कहा कि पिछले साल अक्टूबर में मिदनापुर केंद्रीय सुधार गृह के अधीक्षक द्वारा दोनों अपीलकर्ताओं को जारी हिरासत प्रमाण पत्र प्रमाणित करता है कि उन्होंने प्रमाण पत्र की तारीख तक कुल 15 साल, नौ महीने और 24 दिन की अवधि पूरी की है।

अपील को खारिज करते हुए पीठ ने आगे कहा, 'इसलिए उन्हें राज्य की मौजूदा नीति के अनुसार छूट मांगने की अनुमति दी जाती है और यह उम्मीद की जाती है कि यदि उनके द्वारा ऐसा कोई आवेदन/अभ्यावेदन दिया जाता है, तो उस पर उसके गुण-दोष के आधार पर विधिवत विचार किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि आवेदन दायर करने की तारीख से तीन महीने के भीतर फैसला किया जाएगा।'
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अदालत ने कहा कि मृतक के बड़े बेटे ने सितंबर 1993 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया के एक पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि पीड़िता को पांच आरोपियों ने घेर लिया था, जिन्होंने उस पर हमला किया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पीठ ने कहा कि इस मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए तीन अन्य दोषियों की अपील शीर्ष अदालत ने पहले ही खारिज कर दी थी।
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