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Supreme Court: असम-मेघालय सीमा विवाद हल करने के MoU पर रोक हटी, NTPC प्रमुख को भी सुप्रीम कोर्ट से राहत

Fri, 06 Jan 2023 10:26 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा और असम के उनके समकक्ष हिमंत विश्व शर्मा ने दोनों राज्यों के बीच अक्सर तनाव उत्पन्न करने वाले 12 विवादित क्षेत्रों में से कम से कम छह के सीमांकन के लिए पिछले साल 29 मार्च में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। समझौता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हुआ था। आइए पढ़ते हैं सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें...

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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI
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विस्तार
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असम-मेघालय के बीच सीमा विवाद हल करने के लिए किए गए एमओयू पर लगी मेघालय हाईकोर्ट की रोक आज हट गई। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर स्थगन आदेश जारी कर दिया। 

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हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ असम व मेघालय सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। शुक्रवार को शीर्ष कोर्ट ने असम व मेघालय की याचिका पर सुनवाई हुई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ स्टे जारी कर दिया। इसके साथ ही शीर्ष कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। असम और मेघालय उनके बीच हुए समझौते (MOU) के अनुसार सीमा विवाद हल करना चाहते हैं। 
मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा और असम के उनके समकक्ष हिमंत विश्व शर्मा ने दोनों राज्यों के बीच अक्सर तनाव उत्पन्न करने वाले 12 विवादित क्षेत्रों में से कम से कम छह के सीमांकन के लिए 29 मार्च 2022 को एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। 
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गृह मंत्री की मौजूदगी में हुआ था समझौता
यह समझौता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हुआ था। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंच गया था। मेघालय हाईकोर्ट की एक एकल पीठ ने समझौते के तहत जमीन पर भौतिक सीमांकन या सीमा चौकियों के निर्माण पर गत वर्ष नौ दिसंबर को अंतरिम रोक लगा दी थी। 
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से दाखिल किए गए प्रतिवेदन पर गौर किया। इसमें कहा गया था कि मामले में तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है, क्योंकि हाईकोर्ट की एकल और खंडपीठ ने उस अंतर-राज्यीय सीमा समझौते के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है, जिस पर पिछले साल हस्ताक्षर किए गए थे। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हम इस पर सुनवाई करेंगे। कृपया याचिका की तीन प्रतियां सौंपें।

दरअसल, असम और मेघालय के बीच सीमा विवाद 50 साल पुराना है। हालांकि, हाल के दिनों में इसे हल करने के प्रयासों में तेजी लाई गई है। दोनों राज्यों की सीमा करीब 884.9 किमी लंबी है। असम से अलग करके 1972 में मेघालय का गठन किया गया था, लेकिन नए राज्य ने असम पुनर्गठन अधिनियम 1971 को चुनौती दी जिसके बाद 12 सीमावर्ती स्थानों को लेकर विवाद शुरू हुआ।

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
NTPC प्रमुख ने दी तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) के प्रमुख गुरदीप सिंह की याचिका भी सुनवाई के लिए मंजूर कर ली है। तेलंगाना हाईकोर्ट ने उन्हें अवमानना मामले में दो माह की जेल की सजा सुनाई है। सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी।

इससे पहले सीजेआई डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस पीएस नरसिम्हा राव और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने सिंह की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई पर सहमति दी। इस मामले में एनटीपीसी अध्यक्ष को कुछ गैर-कार्यकारी कर्मचारियों की नियुक्तियों से संबंधित अवमानना मामले में दो माह की जेल की सजा सुनाई गई है।

बता दें, 31 दिसंबर को तेलंगाना हाईकोर्ट ने एनटीपीसी के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक गुरदीप सिंह को दोषी ठहराकर सजा दी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस सजा को निलंबित रखते हुए आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए छह सप्ताह का समय दिया था। 

कॉलेजियम की लंबित सिफारिशों पर केंद्र ने दिलाया भरोसा

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कॉलेजियम की लंबित सिफारिशों पर केंद्र ने दिलाया भरोसा
सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति की केंद्र के पास लंबित सिफारिशों से जुड़े मामले की आगे सुनवाई 3 फरवरी को करने का फैसला किया है। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को शीर्ष कोर्ट को आश्वस्त किया कि वह हाईकोर्टों में 44 जजों की नियुक्ति के सिफारिश के मामले में निर्धारित समय सीमा का पालन करेगी। शनिवार तक सिफारिशों पर निर्णय हो जाएगा। 
 

सुब्रमण्यम स्वामी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
'कोई जेट नहीं, कोई एतिहाद नहीं', सुब्रमण्यम स्वामी ने वापस ली याचिका
इस बीच, भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने जेट एतिहाद एयरवेज के करार को लेकर 2013 में दायर याचिका आज सुप्रीम कोर्ट से वापस ले ली। स्वामी ने जेट एयरवेज और अबू धाबी स्थित एतिहाद एयरवेज के बीच हुए व्यावसायिक करार को खत्म करने की मांग की थी। स्वामी ने आज जस्टिस एम आर शाह और सी टी रविकुमार की पीठ से कहा, 'मैं इसे वापस लेना चाहता हूं, क्योंकि अब कोई जेट नहीं है और कोई एतिहाद नहीं है।' इसके बाद पीठ ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की, 'हम नहीं जानते कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है।' शीर्ष अदालत ने स्वामी के आग्रह को मंजूर करते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। 

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और जे बी पारदीवाला की पीठ  ने शुक्रवार को विभिन्न मुद्दों पर एक समान धर्म और लिंग-तटस्थ कानून बनाने के लिए सरकार को निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या वह विधायिका को विवाह योग्य उम्र, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार, विरासत और गुजारा भत्ता जैसे विषयों पर धर्म और लिंग-तटस्थ कानून बनाने का निर्देश दे सकती है। पीठ ने कहा कि यह विधायी डोमेन में आता है।  

दरअसल, अधिवक्ता याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने तलाक, गोद लेने, संरक्षकता, उत्तराधिकार, विरासत, रखरखाव, विवाह की आयु और गुजारा भत्ता के लिए धर्म और लिंग-तटस्थ समान कानूनों को फ्रेम करने के लिए केंद्र को निर्देश देने के लिए पांच अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं।

कोर्ट का फैसला - फोटो : amar ujala
यौन अपराधों के पीड़ितों को मुआवजे संबंधी याचिका पर केंद्र और चार राज्यों से जवाब मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों के पीड़ितों को मुआवजे से जुड़ी याचिका पर केंद्र और चार राज्यों के विधिक सेवा प्राधिकरणों से शुक्रवार को जवाब मांगा। अदालत ने यह जवाब एक एनजीओ की याचिका पर मांगा है। इस याचिका में एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है जिसमें कहा गया था कि यौन अपराधों के पीड़ितों को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की 2018 की मुआवजा योजना के अनुसार मुआवजा प्रदान किया जाना चाहिए, जो दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भी अनिवार्य है।

सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने एनजीओ ‘सोशल एक्शन फोरम फॉर मानव अधिकार’ की याचिका पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान केंद्र और मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली के राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को नोटिस जारी किया।

इस दौरान एनजीओ की ओर से पेश अधिवक्ता ज्योतिका कालरा ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पीड़ितों के साथ काम करते हुए महसूस किया है कि उन्हें न्याय, मुआवजा और सहायता नहीं मिल पा रही है। साथ ही पीड़ितों और उनके परिवारों को सम्मान के साथ जीने के अधिकार से वंचित होना पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
 कॉलेजियम द्वारा दोहराए गए नाम वापस भेजना चिंता का विषय: SC
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा कॉलेजियम द्वारा दोहराए गए नाम वापस भेजने पर चिंता जताई है।  जस्टिस एस के कौल और ए एस ओका की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक बेहतर प्रणाली लाने से विधायिका को कोई नहीं रोकता है, लेकिन जब तक कानून इसे लागू करता है, तब तक इसे लागू किया जाना चाहिए। पीठ ने आगे कहा कि यह चिंता का विषय है कि सरकार कॉलेजियम द्वारा संवैधानिक अदालतों में जज के पद के लिए दोहराए गए नामों को वापस भेज रही है जबकि मौजूदा परिदृश्य में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे इसे रोका जा सके।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
न्यायालय ने केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एनजीओ को धन वितरण के विनियमन के लिए केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। उन्होंने पूछा कि क्या देश में 32 लाख से अधिक गैर- सरकारी संगठनों (एनजीओ) और स्वयंसेवी संगठनों को सार्वजनिक धन के वितरण के विनियमन के लिए व्यापक योजना बनाने का उसका कोई इरादा है। पीठ ने वकील एम. एल. शर्मा की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जवाब मांगा है। 

सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा, न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज से जवाब दाखिल करने को कहा है।  पीठ ने उनसे कहा कि आप विनियमन के लिए व्यापक विधायी या प्रशासनिक योजना के साथ आएं। इसके बाद पीठ ने विधि अधिकारी को इस बारे में सरकार के रुख से उसे अवगत कराने को कहा  है। 

शीर्ष अदालत ने पहले भी केंद्र से गैर-सरकारी संगठनों और स्वैच्छिक संगठनों को सार्वजनिक धन के वितरण को विनियमित करने के लिए एक कानून बनाने पर विचार करने और दुरुपयोग या हेराफेरी के मामले में मुकदमा चलाने के लिए कहा था।
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