हाईकोर्ट ने मथुरा के छाता थाना प्रभारी प्रमोद पवार और थाने के मुंशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार और आयोग से इस मामले में जवाब मांगा है। प्रमोद पवार की याचिका पर न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति डीके सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की।
याची के अधिवक्ता विजय गौतम की दलील थी कि एससी-एसटी आयोग को किसी भी मामले में सीधे मुकदमा दर्ज करने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। वह सिर्फ सक्षम प्राधिकारी से मुकदमा दर्ज करने की संस्तुति कर सकता है। प्रेमकुमार नामक व्यक्ति ने याची इंस्पेक्टर के खिलाफ एससी-एसटी आयोग से शिकायत की थी। प्रेमकुमार ने छाता थाने में मारपीट का एक केस दर्ज कराया था जिसे पुलिस ने आईपीसी की धारा 323, 324 में दर्ज किया।
वादी की शिकायत थी कि वह दलित है और पुलिस ने मुकदमे में एससी एसटी एक्ट की धाराएं नहीं लगाई हैं। इस शिकायत पर इंस्पेक्टर ने 3 मई 2018 को केस डायरी पर पर्चा काटते हुए एससी-एसटी की धारा बढ़ा दी और विवेचना नियमानुसार क्षेत्राधिकारी को स्थानांतरित कर दी गई। इसके बावजूद प्रेमकुमार ने आयोग के चेयरमैन से मुलाकात कर शिकायत की। चेयरमैन ने इंस्पेक्टर और मुंशी के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया।
इस पर दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। अधिवक्ता की दलील थी कि याची का पक्ष सुने बिना एक तरफा आदेश दिया गया। बिना सुनवाई का मौका दिए और कारण बताओ नोटिस जारी किए मुकदमा दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता है। कोर्ट ने दलील स्वीकार करते हुए मुकदमे पर रोक लगा दी है।