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NRI महिला की गिरफ्तारी पर एमपी पुलिस को कोर्ट ने फटकारा 

Fri, 03 Jun 2016 07:30 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, भोपाल
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सुप्रीम कोर्ट
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अमेरिका में रहने वाली एक एनआरआई महिला डॉक्टर और उसकी मां (वकील) को वर्ष 2012 में गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश को जमकर लताड़ लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे को निरस्त कर दिया है बल्कि राज्य सरकार को उन दोनों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है।
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शीर्ष अदालत ने कहा है कि स्वतंत्रता की अपनी पवित्रता होती है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इन दोनों के खिलाफ मजिस्ट्रेट की अदालत में चल रहे मुकदमे में भारतीय दंड संहिता की धारा-420 (धोखाधड़ी) के अवयव का अभाव है, लिहाजा मुकदमे को निरस्त किया जाता है। अदालत ने कहा है कि रिपोर्ट से यह साफ है कि याचिकाकर्ता दोनों महिलाओं को गिरफ्तार करने में सीआरपीसी के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। पीठ ने कहा कि गैरकाननी तरीके से हुई गिरफ्तारी से याचिकाकर्ताओं के प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। लिहाजा हमारा मानना है कि दोनों को पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा मिलना चाहिए।

अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार को तीन महीने के भीतर मुआवजे की रकम याचिकाकर्ता महिलाओं को देने के लिए कहा है। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तारी होने से व्यक्ति खुद को विचलित और व्यथित महसूस करता है। मामले के मुताबिक, रिनी जौहर और उनकी मां गुलशन जौहर को 27 नवंबर, 2012 को पुणे स्थित उनकेघर से गिरफ्तार किया गया था।
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मध्य प्रदेश साइबर पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर केतहत उन दोनों को गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों पर आरोप लगाया गया था कि कैमरों और लैपटॉप की खरीदारी में हुए 10500 अमेरिकी डॉलर केलेन-देन में उन्होंने घोखाधड़ी की है। इन दोनों को आईपीसी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आरोपित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में दोनों महिलाओं का कहना था कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें रेल के अनारक्षित डिब्बे में लाया गया था। गुलशन जौहर को ट्रेन के फर्श पर सोने पर मजबूर होना पड़ा और वह भी बिना पानी और खाने के। अदालत ने यह भी पाया कि पुणे में बिना मजिस्ट्रेट केसमक्ष पेश किए दोनों को भोपाल लाया गया।
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