सुप्रीम कोर्ट ने सूखे जैसी स्थिति वाले इलाकों में मनरेगा के तहत देरी से भुगतान के एवज में मुआवजा न देने के लिए केंद्र सरकार की खासी खिंचाई की है। सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार के इस रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि मुआवजा न देना एक कल्याणकारी राज्य के आचरण के अनुकूल नहीं है और ऐसा लगता है कि इसने सामाजिक न्याय को तिलांजलि दे दी है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस एनवी रमना की बेंच ने शुक्रवार को कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार के पास मनरेगा के तहत काम करने वालों को मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है। यह भी अफसोस की बात है कि इसने 2015-16 की मजदूरी का बिल भी मामले के लंबित रहने को दौरान क्लीयर किया है। कोर्ट ने कहा है कि सरकार को इस संबंध में अपना रवैया सुधारना चाहिए।
अदालत ने कहा कि मनरेगा के तहत मजदूरों को देरी से भुगतान करने पर 0.5 फीसदी की दर से मुआवजा देने का प्रावधान है। हमें यह देख कर बड़ा दुख हुआ कि भारत सरकार ने 2015-16 के दौरान 7983 करोड़ रुपये का मनरेगा बिल क्लीयर करने के दौरान मुआवजे का कोई प्रावधान ही नहीं किया। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और किसी कल्याणकारी राज्य को शोभा नहीं देता खास कर सूखे जैसी स्थिति में। लगता है कि सामाजिक न्याय को सरकार ने तिलांजलि दे दी है। गौरतलब है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने स्वीकार किया है कि 31, मार्च 2016 तक मनरेगा स्कीम के तहत मजदूरों का 7983 करोड़ रुपये बकाया है। बाद में उसने अप्रैल महीने में एक शपथ पत्र दाखिल करते हुए कहा कि 11,030 करोड़ रुपये राज्यों को एक महीने के अंदर जारी कर दिए जाएंगे। इससे दस सूखा प्रभावित इलाकों में 2723 करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान हो सकता है।