सरकारी विभागों का एक दूसरे के खिलाफ कानूनी लड़ाई में उलझे रहने को सुप्रीम कोर्ट ने दुखद करार दिया है। शीर्ष अदालत ने इसे करदाताओं के पैसों का बेजा इस्तेमाल करना करार दिया है। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारी विभाग और सरकारी उपक्रम एक दूसरे के खिलाफ कानूनी लड़ाई में उलझे रहते हैं।
ऐसा करना न केवल वेवजह अदालत का कीमती समय खराब करना है बल्कि सरकार के संसाधनों का नुकसान पहुंचाना है। साथ ही यह सब करदाताओं के पैसे का दुरूपयोग है। पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा दिए कई आदेशों और सरकार द्वारा दिए दिशानिर्देश के बावजूद सरकारी विभाग अपने विवादों को लेकर कोर्ट आ जाते हैं जबकि इसे लेकर विभागीय नीति भी है। मालूम हो कि मोदी सरकार ने शुरू में कहा था कि विभागों को कानूनी पचरे में नही पड़ना चाहिए, बावजूद इसके यह सिलसिला जारी है।
अदालत ने ये टिप्पणी नॉर्दन कोलफिल्ड लिमिटेड और हेवी एनर्जी कॉरपोरेशन लिमिटेड के बीच कानूनी लड़ाई पर की है। पीठ ने कहा कि यह एक और सटीक उदाहरण हैं जब मसला आपस में सुलझाया जा सकता था लेकिन उसे दरकिनार कर सरकारी उपक्रम अदालत पहुंच गए। इन दिनों के बीच विवाद मध्य प्रदेश के बीना में कोल हैंडलिंग प्लांट के निर्माण की निविदा को लेकर है।
विभागीय मध्यस्था तन्त्र ने हेवी एनर्जी कॉरपोरेशन लिमिटेड के पक्ष में फैसला दिया था। इस निर्णय से असंतुष्ट नॉर्दन कोलफिल्ड लिमिटेड ने दिल्ली हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन हाइकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया कि सार्वजनिक उपक्रमों को अदालत में आने से पहले सरकार की विवाद समिति से इजाजत लेनी जरूरी है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हाइकोर्ट का यह कहना कि सरकार की विवाद समिति से इजाजत लेनी जरूरी है, गलत है क्योंकि 2011 के अदालती आदेश में इस समिति को खत्म कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि विभागीय तंत्र के निर्णय को कानूनन सरकारी उपक्रम कोर्ट में चुनौती दे सकता है।
नॉर्दन कोलफिल्ड लिमिटेड की और से पेश वकील ने पीठ से कहा कि इस मामले में आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया जाए। जिसे स्वीकार करते हुए अदालत ने भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश केजी बालकृष्णन को आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया।