सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन के उस हलफनामे पर हैरानी जताई है जिसमें राज्य के भारत में विलय को ‘रहस्यमयी और विवादास्पद’ बताया गया है। शीर्ष अदालत ने इसका कड़ा संज्ञान लिया है।
शीर्ष अदालत ने राज्य बार एसोसिएशन को कश्मीर में प्रदर्शनों और पत्थरबाजी का सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने में मदद करने को कहा था। इस पर एसोसिएशन की ओर से कश्मीर घाटी में गतिरोध जारी रहने के कारणों को लेकर एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया गया है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने बार से कहा, ‘आपका अतिरिक्त हलफनामा इस स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) के लिए कैसे प्रासंगिक है? हम हैरान हैं। जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल (एसजी) रंजीत कुमार ने हलफनामे के कुछ विवादास्पद हिस्सों का हवाला दिया तो पीठ ने कहा, ‘हम कारण जानना चाहते हैं (बार एसोसिएशन की ओर से विरोध), जो कि एक गलती है।’
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शुरुआत में सॉलिसीटर जनरल ने कहा, एक याचिका जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में भी लंबित पड़ी है। उन्होंने बार एसोसिएशन की ओर से दिए गए अतिरिक्त हलफनामे में कही गई विवादित बातों पर प्रकाश डाला। एसजी ने हलफनामे के हवाले से कहा, ‘वे कहते हैं कि भारत में राज्य के विलय का तरीका रहस्यमयी और विवादास्पद था।
वो आरोप लगाते हैं कि हर चुनाव में धांधली होती है। भारत और पाकिस्तान इस मुद्दे पर तीन जंग लड़ चुके हैं। राज्य 70 साल से संकट में है। कोई भी चुनाव राज्य में भरोसे को बढ़ा नहीं कर सका क्योंकि सभी में धांधली हुई।’ सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि बार एसोसिएशन की ओर से जो भी आरोप लगाए गए हैं वो हाईकोर्ट दाखिल याचिका का हिस्सा नहीं हैं।
पहले, पीठ ने कहा कि वह लंबित याचिका पर हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद मामले को सुनेगी। लेकिन बाद में उसने बार एसोसिएशन की अपील पर सुनवाई के लिए 18 जनवरी की तारीख मुकर्रर कर दी।
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि विवादग्रस्त घाटी में हिंसा रुकने तक कोई सार्थक वार्ता नहीं हो सकती।