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SC: कोर्ट ई-रिक्शा लाइसेंस पर महाराष्ट्र से मांगा जवाब, अधिकारियों को आदेश का मखौल न उड़ाने की दी चेतावनी

Wed, 20 Nov 2024 10:46 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

SC: सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के माथेरान में ई-रिक्शा लाइसेंस के आवंटन पर महाराष्ट्र के अधिकारियों से जवाब मांगा है। साथ ही उन्हें शीर्ष अदालत के आदेश का मखौल न उड़ाने की चेतावनी दी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के माथेरान में ई-रिक्शा लाइसेंस के आवंटन पर महाराष्ट्र के अधिकारियों से जवाब मांगा है। साथ ही उन्हें शीर्ष अदालत के आदेश का मखौल न उड़ाने की चेतावनी दी। शीर्ष अदालत ने 10 जनवरी को कहा था कि ई-रिक्शा केवल हाथ-रिक्शा चलाने वालों को ही दिए जाएंगे ताकि उनके रोजगार के नुकसान की भरपाई की जा सके। मुंबई से लगभग 85 किलोमीटर दूर स्थित इस पहाड़ी क्षेत्र में ऑटोमोबाइल की अनुमति नहीं है।

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शीर्ष अदालत ने 15 अप्रैल को अगले आदेश तक माथेरान में ई-रिक्शा की संख्या 20 तक सीमित कर दी थी। बाद में जुलाई में शीर्ष अदालत ने रायगढ़ के प्रधान जिला न्यायाधीश को हाथ-रिक्शा चालकों को ई-रिक्शा आवंटित करने के विवाद की जांच के लिए एक न्यायिक अधिकारी नियुक्त करने को कहा था। बुधवार को यह मामला जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के समक्ष आया। 

पीठ को बताया गया कि ई-रिक्शा के लाइसेंस हाथ रिक्शा चालकों के अलावा अन्य लोगों को भी दिए गए हैं। इस पर न्यायमित्र वरिष्ठ वकील के परमेश्वर ने कहा कि सरकार ने वास्तव में आपके आदेश का मजाक उड़ाया है। नगर पालिका कर्मचारियों और होटल प्रबंधकों जैसे लोगों को भी लाइसेंस दिए गए हैं। पीठ ने पूछा, एक पार्षद की पत्नी को दो लाइसेंस क्यों दिए गए? पीठ ने चेतावनी दी कि अगली सुनवाई पर संबंधित कलेक्टर को तलब किया जाएगा। इस मामले में अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।
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'आरोपियों के लिए अलग-अलग पैमाना नहीं अपना सकता राज्य'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को किसी मामले में अलग-अलग आरोपियों के लिए अलग-अलग पैमाना लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पश्चिम बंगाल के एक आपराधिक मामले में शीर्ष अदालत ने एक आरोपी को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि राज्य इस मामले में चार अन्य सहआरोपियों को अग्रिम जमानत के आदेश को चुनौती का प्रस्ताव नहीं दे सकता। वहीं, पीठ ने कहा कि दूसरी ओर राज्य सरकार एक अभियुक्त, जो 14 महीनों से जेल में बंद है, उसके जमानत आवेदन का विरोध कर रही है। शीर्ष अदालत कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुनवाई कर रही है, जिसमें एक आरोपी के नियमित जमानत के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस मामले में अपने 19 सितंबर के फैसले में कहा था कि नशीले पदार्थ से जुड़े एनडीपीएस कानून के तहत अग्रिम जमानत देना बेहद गंभीर मसला था। पीठ ने इस मामले में राज्य को निर्देश दिया कि क्या वह अन्य चार सहअभियुक्तों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए कोई आवेदन देगा।

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि राज्य सरकार का चारों सहअभियुक्तों को मिली अग्रिम जमानत को चुनौती देने का कोई प्रस्ताव नहीं है। याचिका का विरोध करते हुए वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता एनडीपीएस कानून से जुड़े गंभीर अपराध में लिप्त था। पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि चीजें बहुत स्पष्ट हैं, यह सब सांठगांठ है। इस मामले को देखते हुए याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है।
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