मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, याचिका की एक प्रति भारत के अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को सौंपी जाए। हम अटॉर्नी जनरल से अदालत की सहायता करने का अनुरोध करते हैं। पीठ ने मामले की सुनवाई आठ सितंबर को तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित न्यायाधीशों की नियुक्ति को अधिसूचित करने हेतु केंद्र के लिए एक समयसीमा तय करने की याचिका पर निर्णय लेने के लिए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की सहायता मांगी है। याचिका शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई थी।
विज्ञापन
पीठ ने कहा कि याचिका की एक प्रति भारत के अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को सौंपी जाए। हम अटॉर्नी जनरल से अदालत की सहायता करने का अनुरोध करते हैं। पीठ ने मामले की सुनवाई 8 सितंबर को तय की है। शीर्ष अदालत वकील हर्ष विभोरे सिंघल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, तत्काल रिट याचिका किसी भी तरह से न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (एससीसी) प्रणाली को चुनौती नहीं देती है। बल्कि, यह अधिक न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एससीसी को और एकजुट एवं मजबूत करने का प्रयास करती है।
याचिका में उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की सिफारिशों को अधिसूचित करने के लिए समय नहीं होने के 'जोन ऑफ ट्विलाइट' को बंद करने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि एक निश्चित समय अवधि के अभाव में सरकार नियुक्तियों को अधिसूचित करने में मनमाने ढंग से देरी करती है, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता को कुचला जाता है, संवैधानिक और लोकतांत्रिक आदेश को खतरे में डाला जाता है और अदालत की महिमा और दूरदर्शिता को अपमानित किया जाता है।
विज्ञापन
इसमें कहा गया है, न्यायालय के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने विवेक को सीमित करने के लिए अपनी भुजाएं पर्याप्त रूप से फैलाए और संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी भी एससीसी अनुशंसा पर आपत्ति जताने के लिए प्रतिवादी के लिए एक निश्चित समय अवधि तय करे और नियुक्तियों को सूचित करने के लिए एक निश्चित समय अवधि तय करे।
संविधान का अनुच्छेद-142 शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित किसी भी मामले में "पूर्ण न्याय" करने के लिए उसके हुक्मनामा और आदेशों को लागू करने से संबंधित है। अनुच्छेद 142(1) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित डिक्री या दिया गया आदेश भारत के पूरे क्षेत्र में निष्पादन योग्य है। याचिका में कहा गया है कि यदि किसी नाम पर आपत्ति नहीं की जाती है या ऐसी निश्चित समयावधि के अंत तक नियुक्तियों को अधिसूचित नहीं किया जाता है, तो ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्तियों को अधिसूचित माना जाना चाहिए।