उच्चतम न्यायालय ने एक जनहित याचिका निर्देश जारी करने से इनकार निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में धार्मिक आयोजनों, राजनीतिक रैलियों और यात्राओं में भगदड़ के रोकने के लिए निर्देशों की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच ने याचिकाकर्ता को केंद्रीय गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग के पास इस मामले को ले जाने को कहा।
यह याचिका तुम्बलम गूटी वेंकटेश द्वारा दायर की गई थी। इसमें उच्चतम न्यायालय से मांग की गई थी कि केंद्र सरकार को सार्वजनिक समारोह में भीड़ नियंत्रण करने के मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने और लागू करने के निर्देश दे।
बेंच ने कहा ने कहा आदर्श आचार सहिंता के दौरान देश भर में राजनीतिक रैलियों में एसओपी लागू करने के लिए भी इसी तरह के निर्देश मांगे गए हैं। याचिकाकर्ता ने रियल टाइम अपडेट के साथ राष्ट्रीय भीड़ प्रबंधन सुरक्षा कोड बनाने की भी मांग की है। इससे पहले भी याचिकाकार्ता इस तरह के मुद्दा उठा चुका है। आगे कहा गया कि किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रमों और समारोहों में कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र की होती है।
सुनवाई के दौरान, बेंच ने ये भी पूछा कि क्या हम ऐसे निर्देश जारी कर सकते हैं? और भीड़ नियंत्रण के लिए अदालत द्वारा कोई दिशानिर्देश देना उचित है।
सवाल का जवाब देते हुए, याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि शीर्ष अदालत ने पहले भी नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप किया था जहां कमजोर लोगों की जान जोखिम में थी। उन्होंने एक पिछली जनहित याचिका का हवाला दिया, जहां अदालत ने एसओपी बनाने का निर्देश दिया था।
इस परमुख्य न्यायाधीश ने पूछा, “मान लीजिए कुछ लोग अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करना चाहते हैं और दिल्ली में धरना देना चाहते हैं। हम इसे रेगुलेट कर सकते हैं ताकि किसी को कोई दिक्कत न हो, और साथ ही बोलने की आजादी की भी रक्षा हो। लेकिन यह कहना कि रैली चेन्नई में होनी है, मैदान में 10,000 लोग आ सकते हैं लेकिन 50,000 लोग आ जाते हैं, तो हम क्या करेंगे?”
क्रिकेट टीम को टीम इंडिया कहने से रोकें...अर्जी खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को उस याचिका को बेकार बताते हुए खारिज कर दिया, जिसमें सार्वजनिक प्रसारक प्रसार भारती को बीसीसीआई की क्रिकेट टीम को टीम इंडिया कहने से रोकने का अनुरोध किया गया था। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के पिछले साल 8 अक्तूबर के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें वकील रीपक कंसल की जनहित याचिका को खारिज कर दिया गया था। पीठ ने कहा, आप बस घर बैठकर याचिका का मसौदा बनाना शुरू कर दें। इस सब में क्या दिक्कत है? अदालत पर बोझ न डालें। याचिका में तर्क दिया गया था कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (बीसीसीआई) को टीम इंडिया या भारतीय क्रिकेट टीम कहना जनता को गुमराह करता है और राष्ट्रीय प्रतीकों के इस्तेमाल से जुड़े कानूनों का उल्लंघन करता है। इसमें दावा किया गया कि एक निजी संस्था होने के नाते, बीसीसीआई को टीम इंडिया नहीं कहा जाना चाहिए, खासकर तब जब भारत सरकार से कोई मंजूरी नहीं है।
अदालत के समय की बर्बादी...
पीठ ने कहा, यह सरासर अदालत और आपके समय की बर्बादी है। यह क्या तर्क है? क्या आप कह रहे हैं कि टीम भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करती? जो टीम हर जगह जाकर खेल रही है, वे उसके बारे में गुमराह कर रहे हैं? बीसीसीआई को भूल जाइए, अगर दूरदर्शन या कोई दूसरा प्राधिकार इसे टीम इंडिया के तौर पर दिखाए, तो क्या यह टीम इंडिया नहीं है।
बीसीसीआई को बताया निजी संस्था
याचिका में कहा गया है कि बीसीसीआई एक निजी संस्था है और इसे न तो राष्ट्रीय खेल महासंघ के रूप में और न ही आरटीआई अधिनियम की धारा 2(एच) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसमें दावा किया गया है कि टीम इंडिया कहना गलत बयानी है और इससे भारतीय ध्वज संहिता का उल्लंघन हो सकता है।