सुप्रीम कोर्ट ने 70 वर्षीय हत्यारोपी को इस आधार पर जमानत दे दी कि इस मामले में उसकी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है। अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय के समक्ष इस तरह की अपीलों की सुनवाई की स्थिति लंबित मामलों को लेकर सर्वविदित है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता पहले ही मामले में 10 साल से अधिक की सजा काट चुका है। जस्टिस एस के कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने उस व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश पारित किया, जिसने उच्च न्यायालय के सितंबर 2019 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। अपीलकर्ता को निस्संदेह धारा 302 (हत्या) आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया गया है, लेकिन उसकी आपराधिक अपील अभी भी विचाराधीन है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष इस प्रकार की अपीलों की सुनवाई की स्थिति अच्छी तरह से ज्ञात है। अपीलकर्ता की उम्र लगभग 70 वर्ष है और वह पहले ही 10 वर्ष से अधिक की सजा काट चुका है। आगरा में दर्ज हत्या के मामले में दोषी सूरजपाल की जमानत अर्जी हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। राज्य की ओर से पेश वकील ने उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया था कि घटना दिन के उजाले में हुई थी और अपीलकर्ता को दोषी ठहराया गया था। मृतक को गोली मारने के जुर्म में आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा था कि अपीलकर्ता के वकील द्वारा जमानत के लिए उसकी प्रार्थना के समर्थन में एकमात्र आधार यह था कि हालांकि वह अगस्त 2013 से जेल में बंद था। बड़ संख्या में लंबित मामलों को देखते हुए उसकी अपील पर सुनवाई की संभावना भी कम थी।