सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट सेवा प्रदाताओं गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और याहू आदि से पूछा है कि क्या वेबसाइट पर अश्लील सामग्री डालने वालों की पहचान का कोई तरीका है। हालांकि शीर्ष अदालत इस बात से राजी नहीं हुई कि इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।
अदालत ने इंटरनेट सेवा प्रदाताओं से कहा कि हम इस पर रोक लगाना चाहते, इसका उपचार नहीं। न्यायमूर्ति एमबी लोकुर और यूयू ललित की पीठ ने कहा कि अश्लील वीडियो साइट पर डालने से महिलाओं और बच्चों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है। कोर्ट ने कहा कि, 'जिसका मन होता है वह बिना अपनी पहचान उजागर किए वीडियो अपलोड कर देता है।
जिससे उसके अंदर कोई भय नहीं रहता।' पीठ ने गूगल के वकील से पूछा कि ऐसा कोई उपाय बताएं जिससे आपत्तिजनक वीडियो डालने वालों की पहचान की जा सके। गूगल के वकील सजन पूवय्या ने कहा कि इंटरनेट सेवा प्रदाता के तौर पर वह केवल ऐसी सामग्री की सूची बना सकते हैं और जब उनके संज्ञान में लाया जाएगा तो ऐसे लोग उसे साइट से हटा लेंगे।
लेकिन इसे रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं है। जिस पर केंद्र सरकार की ओर से पेश एडीशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने कहा कि सेवा प्रदाता कंपनी केवल पैसे कमाना चाहते हैं वे अपनी ओर से कुछ नहीं करेंगे।