पटना की रहने वाली एचआईवी पीड़ित एक महिला ने सुप्रीम कोर्ट से अपने 26 हफ्ते के गर्भ को गिराने की इजाजत मांगी है। इस मामले मेें शीर्ष अदालत ने एम्स को महिला की मेडिकल जांच करने का निर्देश दिया है।
35 वर्षीय बेसहारा महिला फुटपाथ पर रहकर गुजर-बसर करती है। महिला के साथ रेप की घटना के हुई थी जिसकी वजह से वह गर्भवती हो र्गई। फिलहाल वह एक एनजीओ की निगरानी में है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को महिला को पटना से दिल्ली लाने का निर्देश दिया है।
शुक्रवार को एम्स की मेडिकल बोर्ड महिला का परीक्षण करेगी। पीठ ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पीएस नरसिंहा को सोमवार तक मेडिकल रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा है। पीठ ने कहा है कि यह ऐसा मामला है जहां एक महिला गंभीर बीमारी से पीड़ित है। वह असहाय है। उसकी जान बचाने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए।
महिला की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने पीठ के समक्ष कहा कि राज्य सरकार ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कहा कि जब महिला 17 हफ्ते की गर्भवती थी, उसी वक्त राज्य सरकार से गर्भपात कराने की इजाजत मांगी गई थी।
लेकिन अब देरी हो गई है कि और गर्भ 26 हफ्ते का हो गया है। मालूम हो कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971 के प्रावधान के मुताबिक, गर्भधारण के 20 हफ्ते के बाद गर्भपात की इजाजत नहीं दी जा सकती।
लेकिन अधिनियम की धारा-पांच में यह प्रावधान है कि अगर गर्भ के कारण महिला की जान को खतरा हो तो 20 हफ्ते के बाद महिला को गर्भपात कराने की इजाजत दी जा सकती है। सनद रहे कि पिछले दिनों कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने 20 हफ्ते से अधिक के गर्भ को गिराने की इजाजत दे दी थी।