सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 1984 के सिख विरोधी दंगों के पांच मामलों में अभियोजन पक्ष के अहम गवाहों का सही तरीके से परीक्षण करने के उचित प्रयास नहीं किए गए। यही कारण है कि दिल्ली हाईकोर्ट को बरी किए गए लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह पूछना पड़ा कि क्यों नहीं फिर से ट्रायल आदेश दिया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने रिकॉर्ड देखने पर गौर करने के बाद कहा कि अहम गवाहों को ट्रायल के दौरान सिर्फ एक बार समन किया गया और उनके उपस्थित न होने पर साक्ष्यों की रिकॉर्डिंग को बंद कर दिया गया।
पीठ दिल्ली के पूर्व विधायक महेंदर सिंह यादव की याचिका पर सुनवाई कर रही है। यादव ने 29 मार्च 2016 को हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसने उन्हें और दंगों के पांच मामलों से बरी होने वाले आरोपियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। दिल्ली छावनी इलाके में एक और दो नवंबर, 1984 को हुई दंगों की घटनाओं को लेकर दायर शिकायतों पर ये मामले दर्ज किए गए थे।
इन मामलों में यादव के अलावा 10 और लोगों को बरी कर दिया गया था। बरी होने वाले में पूर्व पार्षद बलवान खोखर भी हैं। हाईकोर्ट ने इन सभी से पूछा है कि क्यों नहीं इस मामले को फिर से खोला जाना चाहिए और फिर से ट्रायल चलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई के लिए 21 मार्च की तारीख मुकर्रर की है। साथ ही पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील को शुक्रवार के आदेश की जानकारी हाईकोर्ट तक पहुंचाने के लिए कहा है। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने पीठ से कहा कि इन मामलों को सीबीआई देख रही थी लिहाजा उसे पक्षकार बनाया जाना चाहिए।