सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा ने संवैधाधिन संस्थाओं को राजनीतिक प्रभाव से अलग रखने पर जोर दिया है। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत को अपने संवैधानिक संस्थानों की अखंडता को राजनीतिक रूप से प्रेरित बाहरी हस्तक्षेपों से बचाना चाहिए।
अपने व्याख्यान में, न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि संस्थानों की अखंडता को केवल उन व्यक्तियों की नियुक्ति, निर्णय लेने और हटाने की प्रक्रिया में सुरक्षा उपाय करके बनाए रखा जा सकता है जो इन संस्थानों का नेतृत्व करते हैं। इस दौरान उन्होंने चुनाव आयोग, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक, संघ और राज्य लोक सेवा आयोग और एससी, एसटी और ओबीसी के लिए राष्ट्रीय आयोग की भूमिका के बारे में भी विस्तार से बताया। चुनाव आयोग का उदाहरण देते हुए न्यायमूर्ति ने कहा, "आज, हम यह मान लेते हैं कि संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव कराने के लिए कार्यपालिका के बाहर एक अलग निकाय है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि इसके संस्था बनने से पहले कार्यकारी शाखा जरिए भी चुनाव कराना संभव था।
इस दौरान उन्होंने स्मारक व्याख्यान के विषय, 'संवैधानिक संस्थानों की पुनर्कल्पना: अखंडता, दक्षता और जवाबदेही' पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा यह इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि न्यायमूर्ति वेंकटरमैया न्यायिक राजनेताओं की उस पीढ़ी से थे जिन्होंने संस्थानों को विकसित करने और बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
उन्होंने भारत के संविधान निर्माताओं के दृष्टिकोण की सराहना की, जिन्होंने कार्यपालिका के बाहर एक निकाय के माध्यम से चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण को संस्थागत बनाने का फैसला किया। उन्होंने आगे कहा कि केंद्रीय सतर्कता आयोग और केंद्रीय सूचना आयोग जैसे गैर-संवैधानिक चौथी शाखा संस्थानों को भी राजनीतिक प्रभाव से अलग रखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि हमारा संविधान महज एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक साधन है। उन्होंने कहा कि इसने पारंपरिक तीन शाखाओं कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के लिए संवैधानिक स्थानों का स्पष्ट रूप से सीमांकन किया है।