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भीमा कोरेगांव मामला: गौतम नवलखा को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की जमानत याचिका

Wed, 12 May 2021 12:47 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सामाजिक कार्यकर्ता और एल्गार परिषद के मामले में जेल में बंद गौतम नवलखा को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने गौतम की जमानत याचिका खारिज कर दी है।
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गौतम नवलखा
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विस्तार
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भीमा कोरेगांव मामले में सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने कथित एल्गार परिषद-माओवादी मामले में गौतम नवलखा की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। गौतम नवलखा ने 19 फरवरी को बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। 

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बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने आठ फरवरी को नवलखा की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उसे विशेष अदालत के फैसले में दखल देने का कोई उचित कारण दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं विशेष अदालत ने गौतम नवलखा की याचिका पहले ही खारिज कर दी थी। 

न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की एक पीठ ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ नवलखा कि याचिका खारिज कर दी। उच्च न्यायालय ने मामले में नवलखा को जमानत देने से इनकार कर दिया था। शीर्ष अदालत ने नवलखा की जमानत याचिका पर 26 मार्च को फैसला सुरक्षित रखा था।
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पुलिस के अनुसार, 31 दिसंबर 2017 को पुणे में एल्गार परिषद की बैठक में कथित तौर पर उत्तेजक और भड़काऊ भाषण दिया गया था, जिसके बाद भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की थी। पुलिस ने यह आरोप लगाया कि इस कार्यक्रम को कुछ माओवादी संगठनों का भी समर्थन मिला हुआ था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी इसकी जांच कर रही है।

नवलखा के खिलाफ जनवरी 2020 को दोबारा प्राथमिकी दर्ज की गई थी और पिछले साल 14 अप्रैल को ही उन्होंने एनआईए के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। वह 25 अप्रैल तक 11 दिन के लिए एनआईए की हिरासत में रहे और उसके बाद से ही नवी मुंबई के तलोजा जेल में न्यायिक हिरासत में हैं।

एनआईए की विशेष अदालत ने 12 जुलाई 2020 को गौतम नवलखा की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान गौतम नवलखा ने कहा कि हाउस अरेस्ट की अवधि को हिरासत की अवधि में शामिल किया जाए। हालांकि आठ फरवरी को हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पहले ही उन्हें नजरबंद रखने के आदेश को अवैध घोषित किया जा चुका है। इसलिए गैर कानूनी हिरासत को हिरासत की अवधि में नहीं जोड़ा जा सकता। 

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