शीर्ष अदालत ने मंगलवार को सुनाए गए अपने फैसले में कहा, ''अपीलकर्ता को भारतीय वायुसेना, उसके नियोक्ता द्वारा छह सप्ताह के भीतर राशि का भुगतान किया जाएगा। भारतीय वायुसेना के लिए भारतीय सेना से आधी राशि तक प्रतिपूर्ति की मांग करने का विकल्प खुला है। विकलांगता पेंशन से संबंधित सभी बकाया राशि भी उक्त छह सप्ताह की अवधि के भीतर अपीलकर्ता को वितरित की जाएगी।"
उच्चतम न्यायालय ने भारतीय वायुसेना को निर्देश दिया है कि वह जम्मू-कश्मीर के सांबा में 2002 में एक सैन्य अस्पताल में संक्रमित खून चढ़ाए जाने के कारण एचआईवी की चपेट में आए एक पूर्व सैनिक को मुआवजे के तौर पर करीब 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान करे।
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भारतीय संसद पर 13 दिसंबर, 2001 को हुए आतंकवादी हमले के बाद शुरू किए गए 'ऑपरेशन पराक्रम' के दौरान वह बीमार पड़ गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उन्हें एक यूनिट खून चढ़ाना पड़ा था।
न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने कहा, ''यह माना जाता है कि अपीलकर्ता प्रतिवादियों की चिकित्सकीय लापरवाही के कारण मुआवजे के रूप में 1,54,73,000 रुपये की गणना की गई मुआवजे का हकदार है, इसका भुगतान उन्हें करना चाहिए जो अपीलकर्ता को लगी चोट के लिए जिम्मेदार ठहराए गए हैं। पीठ ने कहा कि चूंकि व्यक्तिगत दायित्व नहीं सौंपा जा सकता है, इसलिए प्रतिवादी संगठनों (वायुसेना और भारतीय सेना) को परोक्ष रूप से संयुक्त रूप से और अलग-अलग जिम्मेदार ठहराया जाता है।
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शीर्ष अदालत ने मंगलवार को सुनाए गए अपने फैसले में कहा, ''अपीलकर्ता को भारतीय वायुसेना, उसके नियोक्ता द्वारा छह सप्ताह के भीतर राशि का भुगतान किया जाएगा। भारतीय वायुसेना के लिए भारतीय सेना से आधी राशि तक प्रतिपूर्ति की मांग करने का विकल्प खुला है। विकलांगता पेंशन से संबंधित सभी बकाया राशि भी उक्त छह सप्ताह की अवधि के भीतर अपीलकर्ता को वितरित की जाएगी।"
शीर्ष अदालत ने भारतीय वायुसेना के पूर्व अधिकारी की अपील पर यह फैसला सुनाया, जिन्होंने मुआवजे के लिए उनके दावे को खारिज करने के राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के आदेश को चुनौती दी थी।