सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 में अहमदाबाद में हुए आतंकी हमले के मामले में बरी किए गए छह लोगों को मुआवजा देने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजा देने से गलत परंपरा बनने का खतरा है। इन छह लोगों को टाडा अदालत ने दोषी करार दिया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने इनसभी को बरी कर दिया था।
मई 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद इन छह आरोपियों ने याचिका दाखिल कर मुआवजा देने की गुहार लगाई थी। इन सभी का कहना था कि उन पर गलत मुकदमा चलाया गया और उन्हें जेल में रहना पड़ा। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इन सभी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मुआवजे की मांग संबंधी याचिकाओं को स्वीकार करना खतरनाक हो सकता है।
ऐसा करने से गलत परंपरा बन जाएगी। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील के टीएस तुलसी से कहा कि अधिकतर अपील सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाती है, क्योंकि यह आखिरी अपीलीय अदालत है। शीर्ष अदालत या तो दोषियों की सजा को बरकरार रखती है या उसे दरकिनार कर देती है।
बरी करने के कई कारण हो सकते हैं। पीठ ने सवाल किया कि क्या ऐसे में हम उन सभी आरोपियों को मुआवजा देने का एलान कर सकते हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट बरी कर देता है। इस पर वरिष्ठ वकील तुलसी ने कहा कि यह मामला दूसरे मामलों से अलग है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इन लोगों को बरी करते हुए गुजरात पुलिस को निर्दोष लोगों पर जबरन मुकदमा चलाने को लेकर फटकार भी लगाई थी। शीर्ष अदालत ने यह इशारा भी किया था कि उस वक्त तत्कालीन गृह मंत्री ने पोटा के तहत इन आरोपियों के खिलाफ अभियोग चलाने की अनुमति देने में दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया था। तब नरेंद्र मोदी गुजरात के गृह मंत्री थे।