राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के मुताबिक पिछले एक साल में पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान 96 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई। आयोग ने सुनवाई के दौरान मृतकों के परिजनों को 8 करोड़ रुपए का मुआवजा देने का आदेश सुनाया। कई मामले ऐसे भी जिसमें राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मुआवजा जारी नहीं कर रही हैं। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि सफाई के लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को बढ़ाए जाने की जरूरत है।
पूरे देश में 53 हजार 236 लोग ढो रहे मैला
हाल ही में सरकार के कराए राष्ट्रीय सर्वे में सामने आया है कि देश के 12 राज्यों के 121 जिलों में 53 हजार 236 लोग मैला ढोने यानी मैनुअल स्कैवेंजर के काम में लगे हुए हैं। जिसमें से उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 28 हजार 796 मैनुअल स्कैवेंजर रजिस्टर्ड हैं। वहीं आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक साल में सफाई के दौरान पूरे देश में 96 लोगों की मौतें हुईं। जबकि अकेले दिल्ली में ही एक साल में 17 सफाई कर्मियों की मौत हुई। वहीं पांच सालों में अकेले दिल्ली में ही पांच सालों के भीतर 74 सफाईकर्मियों की मौत सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान हुई है।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन, 10 लाख का मुआवजा
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष रामशंकर कठेरिया ने बताया कि यह मामले अगस्त 2017 से लेकर जून 2018 तक दर्ज किए गए। आयोग ने कई सुनवाईयों के दौरान राज्य सरकारों और निजी इकाइयों को मृतकों के आश्रितों को 8 करोड़ का मुआवजा देने का आदेश सुनाया। उन्होंने कहा कि आयोग की कोशिश होती है है कि ऐसे हादसों के दौरान हुई मौतों के मामले में मृतकों के परिजनों को तुरंत मुआवजा दिलाया जाए। आयोग के अध्यक्ष रमाशंकर कठेरिया के मुताबिक सीवर सफाई के दौरान सफाई कर्मियों की मौत होने पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक 10 लाख रुपए देने का प्रावधान है।
राज्य सरकारें करती हैं बहानेबाजी
हालांकि कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमें राज्य सरकारों ने ढिलाई बरती है। हाल ही में जून माह में छत्तीसगढ़ के अंजोरा ग्राम पंचायत में नाली सफाई के दौरान एक मजदूर सोमनाथ साहू की मौत हो गई थी। यह ममाला अभी आयोग के समक्ष विचाराधीन है। इस मामले में राज्य सरकार का कहना है कि नाली सफाई का काम दूसरे मजदूरों को दैनिक वेतन पर बुलाया था, जिनके साथ ही मृतक सोमनाथ भी साथ में आ गया और उसकी मौत हो गई। ग्राम पंचायत ने सोमनाथ को अपना कर्मी मानने से इंकार करते हुए मुआवजा देने से इंकार कर दिया।
दिल्ली सरकार के पास ‘बजट’ नहीं
वहीं पिछले साल 6 अगस्त को दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण हॉस्पिटल में सीवर की सफाई के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि तीन अन्य अस्वस्थ हो गए थे। इस मामले में एक साल बीतने पर भी राज्य सरकार ने पैसा जारी नहीं किया है। दिल्ली सरकार फंड न होने की बात कह कर मुआवजा देने से बच रही है। आयोग के मुताबिक दो बार एमसीडी के डिप्टी कमिशनर (पश्चिम) से रिपोर्ट देने के लिए पत्र लिखा जा चुका है, लेकिन अभी तक इस मामले में ढिलाई बरती जा रही है। आयोग के अध्यक्ष रमाशंकर कठेरिया ने बताया कि ज्यादातर मामलों में मुआवजा दे दिया गया है, वहीं कुछेक मामलों में सुनवाई चल रही है, जिनमें जल्द ही मुआवजा देने के आदेश दे दिए जाएंगे। उन्होंने बताया कि एससी-एसटी लगाने के बाद ही मुआवजा देने का प्रावधान है।
ताज ग्रुप ने तुरंत दिया मुआवजा
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल मई में दिल्ली के ताज विवांता होटल के सीवेज संयंत्र के अंदर ज़हरीली गैस के चपेट में आने से पांच लोग गंभीर से रूप से बीमार हो गए थे। इस मामले में दो की मौत हो गई थी। आयोग ने इस मामले में फौरी कार्रवाई करते हुए पीड़ित परिजनों को 70 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश सुनाया। जिस पर ताज ग्रुप में अमल लाते हुए मुआवजा राशि के अलावा मृतकों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा और उनके परिजनों को नौकरी देने वायदा किया।
मैगसेसे पुरस्कार विजेता बोले, हो आधुनिक यंत्रों का प्रयोग
सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक और मैगसेसे पुरस्कार विजेता बेज़वाड़ा विल्सन के मुताबिक सफाई कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर किसी को चिंता नहीं है। सरकारें चुप हैं और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। उन्होंने कहा कि यूरोप और दूसरे देशों में सीवेज सफाई के लिए आधुनिक यंत्रों का प्रयोग होता है और ऐसे में वहां सफाईकर्मियों की मौत की घटनाएं न के बराबर होती हैं। वह कहते हैं कि सेप्टिक टैंक देश में हर कोने-कोने में हैं, जब ये भर जाते हैं, तो सफाई कर्मचारियों इसे साफ करने की जिम्मेदारी दी जाती है। वह कहते हैं कि सरकार इसके लिए अभी तक कोई व्यवस्था या कोई टेक्नोलॉजी क्यों नहीं लाती है।
एक्ट होने के बाद जमीनी स्थिति जस की तस
विल्सन कहते हैं कि 1993 में देश में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने को लेकर पहला कानून आया था, जिसके बाद 2013 में इससे जुड़ा दूसरा कानून आया, जिसमें नाले-नालियों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए रोज़गार या ऐसे कामों के लिए लोगों की सेवाएं लेने पर प्रतिबंध है। लेकिन दो राष्ट्रीय कानून तथा कई अदालतों के आदेश के बावजूद ज़मीन स्तर पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यहां तक कि मैला ढोने और सीवर श्रमिकों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति की नीतियां भी ज्यादा सफ़ल नहीं हुई हैं। विल्सन का कहना है कि स्वच्छ भारत अभियान की बातें करने वाले इस समस्या पर सेफ्टी किट, दस्ताने और मास्क उपलब्ध कराने की बात कहते हैं, लेकिन समस्या के मूल समाधान पर की तरफ़ कोई भी बढ़ता हुआ नहीं दिखता।