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Supreme Court: दुष्कर्म-हत्या केस में अदालत बोली- पुलिस ने बलि का बकरा बनाया; मृत्युदंड पाने वाला व्यक्ति बरी

Wed, 08 Oct 2025 08:18 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में फांसी की सजा पाए व्यक्ति को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मुकदमा एकतरफा हुआ और पुलिस ने आरोपी को 'बलि का बकरा' बनाया। 
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक व्यक्ति को बरी कर दिया, जिसे 2017 में सात साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने कहा कि इस मामले में सुनवाई एकतरफा हुई और पुलिस ने आरोपी को 'बलि का बकरा' बना दिया।
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शीर्ष कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को अपने पक्ष में बचाव करने का जो सांविधानिक अधिकार है, वह केवल दिखावा नहीं होना चाहिए। अदालत और राज्य की जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि किसी को निष्पक्ष सुनवाई और न्याय से वंचित न किया जाए, खासकर तब जब सजा मौत की हो सकती है।

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जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अपील आरोपी दशवंत ने दायर की गई थी। उसने जुलाई 2018 में मद्रास हाईकोर्ट की ओर से सुनाई गई मौत की सजा के फैसले को चुनौती दी थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष मामले से जुड़े अहम बिंदुओं जैसे 'अंतिम बार साथ देखे जाने' का सिद्धांत और डीएनए रिपोर्ट जैसी वैज्ञानिक जांच को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा, जिन पर आरोपी को दोषी ठहराया गया था।

बेंच ने बताया कि आरोपी की ओर से शुरू में कोई वकील मौजूद नहीं था और उसे निशुल्क कानूनी सहायता की सुविधा 13 दिसंबर 2017 को दी गई, जबकि आरोप 24 अक्तूबर 2017 को ही तय कर दिए गए थे। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि मुकदमा एकतरफा और न्याय की मूल भावना के खिलाफ था। अभियोजन ने जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया, उन्हें आरोपी को उपलब्ध ही नहीं कराया गया था और आरोप बिना उचित प्रक्रिया के तय कर दिए गए।

कोर्ट ने कहा कि अगर मुकदमा निष्पक्ष और न्यायपूर्ण होना है, तो आरोपी को अपने बचाव का पूरा अवसर मिलना चाहिए और उसका पसंद का वकील होना बहुत जरूरी है, खासकर ऐसे मामलों में जहां मौत की सजा संभव हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी को 19 फरवरी 2018 को दोषी ठहराया गया और उसी दिन सजा भी सुना दी गई। बेंच ने इसे जल्दबाजी में उठाया गया कदम माना और कहा कि इसने सजा की वैधता को कमजोर कर दिया।

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बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि जिस सीसीटीवी फुटेज को अभियोजन ने पेश किया, उसे न तो सुरक्षित रखा गया, न ही उसका डिजिटल रिकॉर्ड एकत्र किया गया। इससे जांच एजेंसी की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि जांच अधिकारी सच को छिपाना चाहते थे और आरोपी को मामले से बच निकलने का जरिया बना लिया गया।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन द्वारा जिस वीडियो फुटेज पर भरोसा किया गया, वह केवल कल्पना पर आधारित था और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, अभियोजन का यह दावा कि बच्ची का शव आरोपी की निशानदेही पर बरामद हुआ, रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से मेल नहीं खाता। कोर्ट ने कहा कि भले ही यह मामला एक गंभीर अपराध से जुड़ा है। फिर भी न्याय का सिद्धांत यह कहता है कि अभियोजन को आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस और संदेह से परे प्रमाण पेश करने होते हैं। खासतौर पर तब जब मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हो। लेकिन इस मामले में अभियोजन पूरी तरह असफल रहा और अदालत के पास आरोपी को बरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।


 
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