असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के मामले को लेकर सोमवार शाम को गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की है। सोनोवाल की इस मुलाकात को असम के भावी हालातों से जोड़कर देखा जा रहा है। असम सरकार ने 31 दिसंबर को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। उम्मीद जताई जा रही है कि एनआरसी के प्रकाशित होने के बाद राज्य की कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है।
सूत्र बताते हैं कि गृहमंत्री से मुलाकात में सोनोवाल ने एनआरसी प्रकाशन के बाद असम में पैदा होने वाले हालातों से निपटने के लिए उचित सुरक्षा बल के इंतजाम की गुहार लगाई है। राज्य सरकार को आशंका है कि एनआरसी प्रकाशित होने के बाद प्रदेश के मुस्लिम संगठन कानून व्यवस्था के लिए संकट पैदा कर सकते हैं। इसलिए एनआरसी के प्रकाशन से पूर्व ही सोनोवाल ने गृह मंत्री से मुलाकात कर उन्हें प्रदेश में उपजने वाले भविष्य की परिस्थितियों से अवगत कराया है।
गृह मंत्री से मुलाकात के बाद खुद सोनोवाल ने कहा है कि उन्होंने राजनाथ सिंह से एनआरसी और नागालैंड समझौते पर बातचीत की है। एनआरसी पर सोनोवाल ने कहा है कि प्रदेश की जनता को उनपर भरोसा रखना चाहिए।
सोनोवाल के संग राम माधव, दिनेश्वर शर्मा और गृह सचिव भी थे
गृह मंत्री राजनाथ सिंह से सोनोवाल की मुलाकात के वक्त भाजपा महासचिव राम माधव, गृह सचिव राजीव गौवा और जम्मू-कश्मीर के लिए वार्ताकार नियुक्त किए गए दिनेश्वर शर्मा भी वहां मौजूद थे। गृह मंत्रालय सूत्रों के अनुसार राजनाथ सिंह से मुलाकात में इन नेताओं और अधिकारियों ने असम के एनआरसी मुद्दे के अलावा जम्मू-कश्मीर और नागालैंड समझौते पर भी चर्चा की है।
पूर्व आईबी प्रमुख दिनेश्वर शर्मा देश के पूर्वोत्तर हिस्सों में भी प्रमुख भूमिका निभा चुके हैं। इसलिए एनआरसी के बाद असम में पैदा होने वाले हालातों को काबू पाने में भी उनकी भूमिका अहम रह सकती है।
मुस्लिम संगठनों ने दी असम सरकार को चेतावनी
सर्बानंद सोनोवाल
एक तरफ जब असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल एनआरसी के प्रकाशन के बाद राज्य में पैदा होने वाले हालातों को काबू करने के लिए सोमवार को गृह मंत्री के साथ मुलाकात में व्यस्त थे। तो दूसरी ओर देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन उलेमा ए हिन्द ने असम सरकार के कदम पर चेतावनी देते हुए खतरे को म्यामांर से भी बड़ा भयंकर बताया है। उलेमा ए हिन्द के प्रमुख मौलान अरशद मदनी ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि एनआरसी के काम में अगर मतभेद किया जाएगा तो देश की शांति व्यवस्था भंग हो जाएगी, देश जल उठेगा।
उन्होंने असम में नागरिकता के सवाल की तुलना म्यामांर के मुसलमानों से करते हुए कहा कि वहां 7-8 लाख मुसलमानों को नागरिकता नहीं दी गई, बाद में मार के भगा दिया गया। यहां तो 48 लाख महिलाएं और उनके बच्चे, कुल मिलाकर 75 लाख लोगों की नागरिकता खतरे में है। उनके साथ अन्याय हुआ तो वह खतरा म्यामांर से भी बड़ा होगा।
दिल्ली एक्सन कमेटी फॉर असम की ओर से एनआरसी के मुद्दे पर आयोजित कार्यक्रम में जमीयत प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि जबसे असम में भाजपा की सरकार आई है तबसे एनआरसी मुद्दे को धार्मिक रंग देने की कोशिश हो रही है। अपने बाशिंदों को बांग्लादेशी बताया जा रहा है। ये इस मुल्क में म्यांमार की तरह हालात बनाने की कोशिश है। मदनी ने सरकार से मांग की है कि वह 1971 के पहले के सभी बाशिंदों को भारत का नागरिक मानें। उनका तर्क है कि सभी पार्टियों ने 1985 में (राजीव गांधी के समय) इस पर सहमति जताई थी।
मदनी का केंद्र पर आरोप, असम में भेदभाव कर रही है सरकार
केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए मदनी ने कहा है कि एक तरफ, केंद्र सरकार नागरिकता कानून में संशोधन लाकर दूसरे देशों से आने वाले हिन्दू समुदाय के लोगों को नागरिकता और विशेषाधिकार प्रदान कर रही है। तो दूसरी तरफ अपने असली बाशिंदों को बांग्लादेशी या विदेशी नागरिक करार देकर देश से बाहर निकलने पर आमादा है। केंद्र सरकार पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा है कि सरकार धर्म के नाम पर दोहरी नीति अपना रही है।
मदनी ने कहा है कि असम में धर्म और भाषा के नाम पर भेदभाव देश के संविधान और मूल्यों के खिलाफ है। इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने सरकार से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को जल्द प्रकाशित करने की मांग की है। हालांकि इस आयोजन में जमीयत उलेमा ए हिन्द के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने इसकी तुलना म्यामांर के रोहिंग्या मुसलमानों से की। लेकिन आयोजकों से खुद को बड़ी सावधानी से उनसे अलग दिखाने की कोशिश की।
क्या है एनआरसी का मामला, क्यों बरपेगा हंगामा
Sarbananda Sonowal
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असम में इन दिनों राष्ट्रीय नागरिकता पंजिका यानि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) पर काम चल रहा है। यह रिकार्ड सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में एकत्र किया जा रहा है। इसका उद्देश्य असम में लंबे समय से चले आ रहे नागरिकता के विवाद को समाप्त करना है। ताकि घुसपैठ कर आए लोगों को चिन्हित किया जा सके। असम सरकार ने एनआरसी के प्रकाशन के लिए 31 दिसंबर का मन बनाया है। गृह मंत्रालय सूत्रों की मानें तो सूबे में अभी बांग्लादेशी मुस्लमानों की संख्या करीब 1.4 करोड़ है।
लेकिन एनआरसी के प्रकाशित होने के बाद करीब 30 लाख बांग्लादेशी मुस्लमानों की नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी। बताया जा रहा है कि एनआरसी के जो आंकड़े एकत्रित हुए हैं उनमें वर्ष 1971 के बाद भारत के नागरिक बने बांग्लादेशी मुस्लमानों की संख्या करीब 30 लाख है। एनआरसी प्रकाशन के बाद ऐसे मुस्लमानों की नागरिकता खतरे में पड़ सकती है। उनके नाम न सिर्फ मतदाता सूची से काटे जाएंगे बल्कि उनके राशन कार्ड, जॉब कार्ड और आधार कार्ड तक नहीं बन सकेंगे। हालांकि इन मुस्लमानों को देश से निकाला नहीं दिया जाएगा।
मगर वे भारत की नागरिकता से महरूम हो जाएंगे। यही वजह है कि एनआरसी के प्रकाशित होने के बाद प्रदेश सरकार को सूबे की कानून व्यवस्था बिगडऩे की आशंका सता रही है। सरकार ने समय से पहले ही मामले से गृह मंत्रालय को अवगत करा दिया है। प्रदेश सरकार की मजबूरी है कि वह बांग्लादेशी घुसपैठियों के मामले को असम की अस्मिता के रूप में भूना कर राज्य की सत्ता में आई है। इसलिए सरकार के सामने मजबूरी है कि जनता के सामने किए वायदे को वह पूरा करे।
हालांकि एनआरसी के प्रकाशन के बाद सरकार के अपने संगठनों की ओर से भी इसका विरोध हो सकता है। क्योंकि संघ की हमेशा से यह मांग रही है कि एनआरसी के लिए आधार 1971 को मानने के बजाय 1952 माना जाना चाहिए। एनआरसी प्रकाशन के बाद संघ संगठन इसे वर्ष 1952 से आधार मानने की मांग कर सकते हैं। असम में नागरिकता का सवाल लंबे समय से चुनौती व संघर्ष का कारण बना हुआ है।
आसू के आंदोलन को थामने के लिए राजीव गांधी के पीएम कार्यकाल में वर्ष 1985 में एक समझौता हुआ था, जिसे असम समझौता के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार 25 मार्च, 1971 से पहले असम की नागरिकता पाए या किसी भी रूप में दर्ज हुए लोगों और उनकी संतति को ही राज्य का नागरिक माना जाएगा। इसी को दर्ज करने के लिए एनआरसी का काम चल रहा है। प्रदेश सरकार ने इसे 31 दिसंबर को प्रकाशित करने का निर्णय लिया है।