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Samwad 2025: संवाद के मंच पर मनोज मुंतशिर, कहा- 2017 में जीवन का पहला बड़ा मंच अमर उजाला ने दिया, आज भी ऋणी

Fri, 18 Apr 2025 05:24 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ

सार

अमर उजाला संवाद के मंच पर गीतकार, लेखक और कवि मनोज मुंतशिर ने बेबाकी से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि वे आज भी अमर उजाला के ऋणी हैं कि इसी संस्थान ने उन्हें साल 2017 में जीवन का पहला बड़ा मंच दिया था। उन्होंने बातचीत की शुरुआत में ही आदिपुरुष फिल्म को लेकर हुए विवाद को लेकर एक बार फिर खेद प्रकट किया।
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अमर उजाला संवाद 2025 के मंच पर मनोज मुंतशिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमर उजाला संवाद 2025 के मंच पर मनोज मुंतशिर ने अपने करियर, लेखन, कविता, शेर-ओ-शायरी, फिल्मों के डायलॉग और शोहरत की बुलंदियों को छूने के बाद के जीवन जैसे विविध पहलुओं पर विस्तार से बात की। संवाद 2025 के मंच पर मनोज मुंतशिर ने सबसे पहले इस बात का उल्लेख किया कि अमर उजाला के साथ उनका खास नाता है। उन्होंने बताया कि साल 2017 में जीवन का पहला बड़ा मंच अमर उजाला ने कानपुर में दिया था। वे इस बात के लिए आज भी ऋणी हैं कि पहली बार हजारों लोगों के सामने बोलने का अवसर मुझे अमर उजाला ने दिया। इसका मैं शुक्रगुजार हूं।
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मनोज मुंतशिर ने कहा, लखनऊ से क्या झूठ बोलना। इसका दुख हमेशा रहा कि मैंने उस फिल्म (आदिपुरुष) के संवाद लिखे। वो खराब थे, अशोभनीय थे। हालांकि, फिल्म के गीत हिट हुए। उसके लिए थोड़ा सा श्रेय मुझे मिल जाता तो अच्छा तो लगता। 

लखनऊ के लोगों को नाराजगी का हक है
मेरे घर के बगल की दुकान का पनवाड़ी भी मुझे नहीं पहचानता था कि मैं कौन हूं। तो जितनी बार लोग मुझसे नाराज होंगे, मैं सवाल पूछने नहीं, सिर्फ माफी मांगने आऊंगा। लोगों को नाराजगी का हक है। 
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भटकाव के बाद राम की शरण
जीत ने अंधा कर दिया है तुझे, तुझको एक हार की जरूरत है... मुझे यह मानने में आज कोई संकोच नहीं है कि हां, मैं अपनी जड़ से थोड़ा भटक गया था। मुझे फिल्म आदिपुरुष की जरूरत थी, एक हार की जरूरत थी ताकि मैं अपनी जड़ों की ओर लौटूं। हर कोई मुश्किल में श्रीराम की शरण में जाता है, मैं भी उनकी शरण में गया।

कविता किया है? मनोज मुंतशिर से जानिए
मनोज मुंतशिर ने कहा, जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें लगता है कि आदिपुरुष जैसी घटना होनी ही थी। इसी के बाद उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हुआ, लेकिन जनता ने उन्हें माफ भी किया। मनोज ने कहा कि आदिपुरुष के बाद वे भक्ति गीत लिख रहे हैं। उन्होंने अमेरिकी कवयित्री एमिली डिकिंसन के कथन का उल्लेख किया और कहा कि जब तक भगवान आपको संकेत नहीं करते आप एक भी शब्द नहीं रच सकते।

मशूहूर रचनाकारों की नज्म के अंश भी पढ़े
उन्होंने फैज-अहमद फैज की मशहूर रचना- तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है, साहिल लुधियानवी की नज्म- ये दुनिया अगर मिल भी जाए, नरोत्तम दास की भक्ति कविता- मेरे हिय हरि के पद पंकज बार हजार लै देख परीक्षा औरन को धन चाहिए बावरी, ब्राह्मण को धन चाहिए बावरी, ब्राह्मण को धन केवल भिक्षा जैसी रचनाएं नहीं लिखी जा सकतीं।

सबसे अधिक किस परंपरा से जुड़ाव महसूस करते हैं?
मनोज मुंतशिर: 
18 मार्च, 1999 को गौरीगंज से निकला था। 362 रुपये का टिकट लेकर मुंबई जाने के लिए चारबाग स्टेशन से पुष्पक एक्सप्रेस पकड़ी थ। उस समय दिमाग में इतना स्पष्ट था कि साहित्य और लोकप्रियता के बीच क्या कोई ऐसी जगह है जहां साहित्य आम लोगों से जुड़े। क्या कोई ऐसी जगह है जहां संगम हो सकता है? मुझे फिल्मी गीतों में यह क्षमता दिखी।

मनोज ने दीवान-ए-गालिब का उदाहरण देकर समझाया;
दीवान-ए-गालिब के पहले पन्ने पर जो नज्म लिखी है-- नक्श फरियादी है जिसकी शोखी-ए-तहरीर का... फिल्मों का गीतकार जब इसे आसान भाषा में बयां करता है तो लिरिक्स- तुम बिन जिया जाए कैसे, कैसे जिया जाए तुम बिन बन जाता है। इस गीत में भी बिल्कुल वही बात लिखी है, जो गालिब की नज्म में है।
 

अमर उजाला संवाद में मनोज मुंतशिर - फोटो : अमर उजाला
क्या साहित्यिक सभाओं में फिल्मी गीतकारों का बहिष्कार-
मनोज मुंतशिर ने बताया, बहुत बार ऐसा हुआ है जब साहित्यकारों की सभाओं में फिल्मी गीत लिखने वाले लोगों को उचित सम्मान नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से भी ऐसा झेल चुके हैं। हमारे बड़े जिनसे हम सीखते हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या दुनिया में कोई फिल्मी गीतकार किसी अज्ञेय, निराला, रामधारी सिंह दिनकर के खिलाफ खड़ा है? हम इनकी बातों को अपने सारगर्भित तरीके से कहते हैं, ताकि लोकप्रियता बढ़े, बात दूर तक पहुंचे। अक्सर ऐसा होता है कि साहित्य के ठेकेदार हमें वाजिब श्रेय नहीं देना चाहते। नजीर अकबराबादी, बाबा तुलसीदास और नरोत्तमदास के साथ भी ऐसा ही हुआ। मैं तो इनसे बहुत छोटा हूं।

अमर उजाला संवाद के मंच पर मनोज मुंतशिर - फोटो : अमर उजाला
सोशल मीडिया पर क्या नफरत का बाजार नहीं चल रहा? उर्दू को पाकिस्तान की भाषा बता देते हैं।
मनोज मुंतशिर:
उर्दू को पाकिस्तान की भाषा बताने पर मुझे शर्मिंदगी होती है। पाकिस्तान उर्दू पर अपना हक जमाए, लेकिन वह तो कश्मीर पर भी हक जमाता है। क्या कश्मीर पर उनका हक मान लेते हैं? अगर नहीं तो उर्दू पर पाकिस्तान के हक को क्यों मान लेते हैं? तीन लाइनें उर्दू का शब्द शामिल किए बिना क्या बोली जा सकती हैं?

अमर उजाला संवाद के मंच पर मनोज मुंतशिर का बयान - फोटो : अमर उजाला
आप लोगों को नफरती चिंटू लिख देते हैं, दूसरे भी तो मंच के कवि हैं, वो भी श्रीराम पर बातें करते हैं?
मनोज मुंतशिर:
मैंने बहुत विशेष संदर्भ में यह बात कही थी। यहां बात मेरे बड़े भाई की हो रही है, जो कि एक बहुत बड़े कवि हैं, वो श्रीराम पर जो शो करते हैं, वो अद्भुत होता है। लेकिन यह भी सच है कि आप कुछ लोगों को खुश करने या तालियां बटोरने के लिए यह नहीं कह सकते कि आप इसे हीरो बनाना चाहते हैं तो हम तो इसे खलनायक भी नहीं बनने देंगे। अगर आप किसी बच्चे (तैमूर अली खान) को राजनीति का विषय बनाएंगे तो यह आपकी छोटी सोच है। इसमें श्रीराम का दर्शन नहीं नजर आता। किसी के घर (शत्रुघ्न सिन्हा) की अंदरूनी बातों में आप किस तरह दाखिल हो जाते हैं? किसी परिवार में उसकी बेटी दुखती रग है, आप वहां नहीं जा सकते। अगर इसके जवाब में मैंने कह दिया कि कोई दीवाना कहता है, कोई चिंटू कहता है तो क्या गलत कहा।
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मनोज मुंतशिर - फोटो : इंस्टाग्राम- @manojmuntashir
लिखे हैं ये मशहूर गाने
मनोज मुंतशिर ने अपने भावपूर्ण गीतों से हिंदी सिनेमा में खास पहचान बनाई है। उनके लिखे गाने ‘तेरी मिट्टी’ (केसरी), ‘गलियां’ (एक विलेन), ‘तेरे संग यारा’ (रुस्तम), ‘कौन तुझे’ (एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी) और ‘फिर भी तुमको चाहूंगा’ (हाफ गर्लफ्रेंड) ने दर्शकों के दिलों को छुआ और हर तरफ तारीफ बटोरी। इन गीतों की गहराई और सादगी ने मनोज को इंडस्ट्री के सबसे पसंदीदा गीतकारों में से एक बना दिया।

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इस फिल्म के गाने के लिए मिला राष्ट्रीय पुरस्कार
मनोज ने इंडिया गॉट टैलेंट और इंडियन आइडल जूनियर जैसे रियलिटी शोज के लिए स्क्रिप्ट लिखी। 2019 में उनकी पहली किताब 'मेरी फितरत है मस्ताना' प्रकाशित हुई, जो उनकी कविताओं का संग्रह है। मनोज मुंतशिर ने अपने शानदार काम से कई प्रतिष्ठित अवॉर्ड अपने नाम किए हैं। उन्होंने 2014 में ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ के लिए बेस्ट स्क्रिप्ट का अवॉर्ड जीता। इसके अलावा 2015 में ‘गलियां’ (एक विलेन) के लिए उन्होंने आईफा और स्टार गिल्ड जैसे पुरस्कार अपने नाम किए। 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती और उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान से नवाजा। साल 2022 में फिल्म ‘साइना’ के लिए उन्हें 68वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवॉर्ड मिला।

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इन फिल्मों के संवाद हुए खूब लोकप्रिय

बाहुबली: द बिगिनिंग और बाहुबली: द कन्क्लूजन (हिंदी डबिंग) के संवाद मनोज ने ही लिखे है, जो दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए। खास तौर पर "औरत पर अंगुली उठाने वाले की अंगुली ही नहीं काटी जाती, काटा जाता है उसका गला" जैसे संवाद आज भी याद किए जाते हैं। उन्होंने 'आदिपुरुष 'के सवांद भी लिखे थे। 
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