पायलट ने कहा,'गुरुवार से नया महीना शुरू होगा लेकिन, मैंने अपने नौजवान साथियों से सार्वजनिक रूप से जो वादा किया है, वो हवाई बातें नहीं हैं। यह कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे कोई गलत कह सकता है। कांग्रेस पार्टी हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ रही है, युवाओं के साथ रही है। राहुल गांधी खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वही मैं भी कर रहा हूं। युवाओं को न्याय दिलाना और बीजेपी सरकार में हुए भ्रष्टाचार पर जांच बैठना अनिवार्य है। इस पर कोई समझौता नहीं होगा।'
इस तरह फिर टल जाएगा पायलट की मांगों पर फैसला
कांग्रेस पार्टी से जुड़े विश्वस्त सूत्र कहते हैं कि, पायलट ने 15 दिन का अल्टीमेटम दिया था। वह खत्म होने से पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष के घर बैठक के बाद केसी वेणुगोपाल ने गहलोत-पायलट के एकजुट होकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। पार्टी ने संदेश दिया कि दोनों एक हो गए है। अब कोई आंदोलन की तैयारी नहीं है। पायलट की मांगों पर फैसले का मामला हाईकमान पर छोड़ा गया है। आम तौर पर देखा गया है कि कांग्रेस में जब भी किसी मामले को लंबा खींचना होता है तो उसके लिए फैसला हाईकमान पर छोड़कर आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई जाती रही है।
सूत्र कहते हैं कि, पायलट की तीनों मांगें सरकार से जुड़ी हैं, इनका पूरा होना उतना आसान नहीं है। इस मुद्दे पर दुविधा दूर करने के लिए ही हाईकमान पर फैसला छोड़ने की रणनीति अपनाई गई है। इससे पायलट की राह भी आसान हो जाएगी। वे अपने समर्थकों को साफ कह सकेंगे कि कांग्रेस हाईकमान फैसला कर रहा है। तब तक थोड़ा समय निकल जाएगा। फिर पार्टी चुनाव में जुट जाएगी। इससे पहले भी पायलट कुछ मांगों को हाईकमान के सामने उठा चुके है। लेकिन अभी तक उन पर भी कोई फैसला नहीं हुआ हैं। इन्हीं मांगों पर वे कई बार कांग्रेस हाईकमान को नाराज भी कर चुके हैं। जिसे गहलोत गुट पार्टी विरोधी गतिविधि बता चुका है लेकिन उन पर भी कांग्रेस नेतृत्व ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है।
'सुलह अस्थाई, कभी भी खुल सकता है फिर से मोर्चा'
प्रदेश के राजनीतिक जानकार प्रो.एस के शर्मा का कहना है कि हाईकमान ने दखल देकर कुछ समय के लिए समझौता भले करवा दिया, लेकिन पायलट की सियासी मांगों को भी चुनाव के वक्त पूरा करना आसान नहीं है। गहलोत भी विधायकों के समर्थन के भरोसे कई मुद्दों पर अड़े हुए हैं। इन दोनों का समझौता अस्थाई है। दोनों नेता कभी भी एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। पिछले चार साल में बयान देने में गहलोत ज्यादा आक्रामक रहे हैं। जबकि सचिन बहुत कम मौके पर उनके खिलाफ मुखर दिखाई दिए। हालांकि मई में पैदल यात्रा से पहले और यात्रा के दौरान पायलट ने गहलोत सरकार के खिलाफ सख्त तेवर दिखाए थे।
अमर उजाला से बातचीत में स्थानीय कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चुनाव में बहुत कम वक्त बचा है। इसलिए गहलोत आए दिन कोई नई लोकलुभावन घोषणा कर रहे हैं। वे भी नहीं चाहते है कि चुनाव से ठीक पहले अब कोई नया सियासी बवाल खड़ा हो। सचिन पायलट के अनशन और फिर पैदल यात्रा के बाद प्रदेश की सियासत का 'नैरेटिव' बदल गया है। सरकार के राहत कैंपों का असर पायलट के विरोध के कारण थोड़ा फीका पड़ा है। लेकिन दोनों नेताओं के बीच सुलह की खबरों से थोड़ा मामला संभला है। अब यह कब तक कायम रहता है यह कहना मुश्किल है।
पायलट के अल्टीमेटम की ये तीन मांगे, अब इनका क्या?
सचिन पायलट की ओर से गहलोत सरकार के सामने तीन मांगें रखी गई थी। उन्होंने पहली मांग पूर्ववर्ती वसुंधरा सरकार के कथित भ्रष्टाचार की जांच को लेकर की थी। दूसरी मांग आरपीएससी को भंग करने और तीसरी मांग पेपर लीक के प्रभावित बच्चों को मुआवजा देने की उठाई थी। ऐसा नहीं करने पर पूरे प्रदेश में आंदोलन करने की चेतावनी दी। अब सवाल यह है कि बुधवार को अल्टीमेटम का समय पूरा हो गया है। ऐसे में पायलट का अगला कदम क्या होगा, सबकी निगाह अब इसपर है।