केरल में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अहम सुनवाई से ठीक पहले इस विषय ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। विपक्ष ने सत्तारूढ़ एलडीएफ सरकार से साफ रुख बताने की मांग की है। सवाल यह है कि सरकार अदालत में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन करेगी या अपना पुराना हलफनामा वापस लेगी।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले बढ़ी सियासी हलचल
यह मुद्दा इसलिए फिर सामने आया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट सोमवार को 2018 के फैसले से जुड़े रिव्यू और रिट याचिकाओं पर विचार करने वाला है। उस फैसले में हर उम्र की महिलाओं को भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। विपक्षी कांग्रेस का कहना है कि सरकार को अदालत में जाने से पहले जनता को अपना रुख साफ-साफ बताना चाहिए। उनका आरोप है कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर अब तक असमंजस की स्थिति में है।
विपक्ष का सवाल, सरकार का जवाब गोल
नेता प्रतिपक्ष वी डी सतीशन ने मुख्यमंत्री विजयन से पूछा कि क्या सरकार अब भी सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने पुराने हलफनामे के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है तो उसे मजबूती से अदालत में यही बात रखनी चाहिए। अगर नहीं है तो हलफनामा वापस लिया जाए। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने भी कहा कि पूरे केरल में सरकार से साफ रुख की मांग हो रही है और पीछे हटना जनता के साथ धोखा होगा।
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सीपीआई(एम) का रुख, अभी कुछ कहना जल्दबाजी
सत्तारूढ़ दल सीपीआई(एम) ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पार्टी के राज्य सचिव एम वी गोविंदन ने कहा कि सरकार अपना पक्ष अदालत में ही रखेगी और अभी इसे सार्वजनिक करना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि भक्तों की भावनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों दोनों का सम्मान किया जाएगा। पार्टी के वरिष्ठ नेता ए विजयराघवन ने भी कहा कि यह मामला बेहद जटिल है और सभी पक्षों को सुनने के बाद ही कोई ठोस फैसला लिया जाना चाहिए।
एनएसएस और कानून मंत्री की अलग राय
इस बीच नायर सर्विस सोसाइटी ने भी सरकार से महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने वाला नया हलफनामा दाखिल करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि सदियों पुरानी परंपराओं से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। वहीं, राज्य के कानून मंत्री पी राजीव ने कहा कि सरकार पर जल्दबाजी का दबाव बनाना गलत है।
उन्होंने साफ किया कि सरकार अपना पक्ष तभी रखेगी, जब सुप्रीम कोर्ट उससे पूछेगा। गौरतलब है कि 2018 के फैसले के बाद केरल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे और यह मुद्दा आज भी सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है।
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