बाघ को साल का जंगल बेहद पसंद है। पहले से ही साल पर संकट (बायोटिक प्रेशर) मंडरा रहा था, अब मौसम परिवर्तन के कारण नई चुनौती सामने आ गई है। मौसम में बदलाव के कारण साल की पत्तियों के गिरने और नई पत्तियों के निकलने का समय ही बदल गया है। इसके साफ संकेत जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन इनवायरमेंट एंड सस्टेंबल डेवलेपमेंट (अल्मोड़ा) के कई सालों के अध्ययन में सामने आया है।
मौसम परिवर्तन का असर हिमालय की वनस्पतियों पर पड़ रहा है, उसके संकेतक (इंडीकेटर) तैयार करने का काम जीबी पंत इंस्टीट्यूट द्वारा 2010 से शुरू किया गया। पहले साल के जंगल के संबंध में कुमाऊं विवि के 1986 से 1988 तक के पुराने अध्ययन, डाटा को एकत्र किया गया। इसके बाद साल के जंगल के कुछ क्षेत्रों को चिह्नित किया गया, फिर चिह्नित जंगल के क्षेत्र 2001 से 2013 तक सेटेलाइट मैप का अध्ययन किया गया। इस दौरान वैज्ञानिकों ने फील्ड विजिट कर डाटा, फोटोग्राफ भी जुटाए।
रिसर्च से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक सुब्रत शर्मा कहते हैं कि फिनोलॉजी (पत्तियों का अध्ययन) के तहत व्यापक डाटा, जानकारी जुटाई गई। इससे साफ पता चलता है कि साल पर मौसम परिवर्तन का असर पड़ा है, उसकी पत्तियों के गिरने और नई पत्तियों के आने का समय बदल गया है। पत्तियां गिरने के समय में 2 से 28 दिन तक का अंतर आ गया है। पहले साल पर पत्तियां अप्रैल के महीना शुरू होने के साथ गिरने लगती थी, अब वह मार्च के महीने में खिसक गई है। इसी तरह नई पत्तियां 2001 तक अप्रैल के मध्य में आती थी, अब शुरुआती अप्रैल या मार्च के महीने में आने लगी हैं।
यह अंतर 5 दिन से लेकर 15 दिन तक हो, पर बदलाव साफ है। यह केवल अचानक किसी वर्ष में होने वाली घटना मात्र नहीं है, बल्कि साल दर साल यही ट्रेंड देखने को मिला है। साल की पत्तियों के समय चक्र में बदलाव से उसके बीज बनने से लेकर दूसरी प्रक्रिया पर भी असर पड़ेगा। डॉ. शर्मा कहते हैं कि अब यह देखा जाना है कि मौसम परिवर्तन के अनुरूप साल अपने को कैसे ढाल पाता है? अगर बदलाव रहा, तो जंगल के साथ वन्यजीवों और फूड चेन पर भी असर पड़ सकता है।
साल संरक्षण की योजना
साल के जंगल पर लंबे समय से बॉयोटिक प्रेशर (चराई, वनाग्नि आदि) के कारण नई वृक्ष की प्रजातियों के तैयार होने पर संकट पर है। वन विभाग साल के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए साल सहायतित प्राकृतिक पुनरोत्पादित योजना चला रहा है। इसमें साल के जंगल वाले एरिया को सुरक्षित करने के साथ ही वैज्ञानिकों की मदद भी ली जा रही है। तराई पूर्वी वन प्रभाग के सुरई जंगल (खटीमा) में कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। अब मौसम परिवर्तन की नई चुनौती सामने आई है।
साल को लेकर कहावत
साल का जंगल बाघ को बेहद पसंद है। जिम कार्बेट ने चर्चित बैचलर ऑफ पवलगढ़ नाम से मशहूर हुए बड़े टाइगर को साल से लकदक पवलगढ़ क्षेत्र में ढेर किया था। यहां की जैव विविधता को देखते हुए ही बाद में पवलगढ़ कंजरवेशन रिजर्व बनाया गया, जिससे संरक्षण का कार्य और बेहतर ढंग से हो सके। साल की लकड़ी मजबूती के लिए भी बेमिसाल है। सौ साल खड़ा, सौ साल पड़ा और सौ साल में सड़ा जैसी कहावत उसकी मजबूती को बया करती है। नंधौर अभ्यारण्य में एक अनुमान से कुतुबमीनार से ऊंचा एक सीधा साल का पेड़ है, जो भी इस पेड़ को देखता है, तो बस देखता ही रह जाता है।