विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत के बदलते वैश्विक संबंधों और विदेश नीति को लेकर अहम बातें कही हैं। दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ संबंधों को आगे बढ़ाना आसान नहीं है। दुनिया में अमेरिका की भूमिका और दूसरे देशों के साथ उसके व्यवहार में बदलाव आया है। ऐसे में हर देश को अपने रिश्तों का नए सिरे से आकलन करना पड़ रहा है। जयशंकर ने भारत की रणनीति को समझाते हुए कहा कि अमेरिका के साथ जुड़ना और चीन को संभालना, दोनों जरूरी हैं।
विदेश मंत्री ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत, चीन के साथ सीमा पर शांति, यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए), रूस के साथ संबंधों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के नियमन जैसे मुद्दों पर भी अपनी बात रखी।
अमेरिका के साथ रिश्ते आसान नहीं, हर देश कर रहा आकलन
ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के कार्यक्रम में जयशंकर ने कहा कि अमेरिका के साथ संबंधों को संभालना केवल भारत के लिए चुनौती नहीं है। अमेरिका ने दुनिया के साथ जुड़ने के अपने तरीके और संबंधों की बुनियाद में बदलाव किया है। ऐसे में हर देश को अपने रिश्तों का फिर से आकलन करना और नई परिस्थितियों के अनुसार उन्हें तय करना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2020 में ही वह ब्रेक्जिट, डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव और वैश्वीकरण के खिलाफ बढ़ती प्रतिक्रिया जैसे घटनाक्रमों पर विचार कर रहे थे। इन बदलावों के आधार पर वह समझने की कोशिश कर रहे थे कि दुनिया किस दिशा में जाएगी और भारत को किस तरह प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
अमेरिका से भारत का रणनीतिक साझेदारी वाला रिश्ता
विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका अपने गठबंधनों और संधियों से जुड़े संबंधों की शर्तों की समीक्षा कर रहा है। इसका असर यूरोप और पूर्वी एशिया के कुछ देशों पर भी महसूस किया जा रहा है। हालांकि, भारत के मामले में स्थिति अलग है, क्योंकि भारत अमेरिका का आधिकारिक सैन्य सहयोगी नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार है। उन्होंने कहा कि पिछले करीब 20 वर्षों में दोनों देशों ने साझा हितों और आपसी सहमति वाले मुद्दों पर मिलकर काम किया है। जयशंकर के मुताबिक, इस बुनियादी समझ में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर क्या बोले जयशंकर?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की बातचीत पर जयशंकर ने कहा कि कुछ मुद्दों पर अभी काम होना बाकी है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से बातचीत का पूरा ब्योरा साझा करने से परहेज किया। उन्होंने बताया कि अमेरिका जैसे बड़े बाजार के साथ व्यापार समझौते में केवल दोनों देशों के बीच तय होने वाली शर्तें ही मायने नहीं रखतीं, बल्कि यह भी देखना पड़ता है कि प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारत की स्थिति क्या होगी।
जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों के संबंधित मंत्री और अधिकारी इस दिशा में काम कर रहे हैं। उनके आकलन के मुताबिक, बातचीत किसी नतीजे तक पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने अमेरिका की शुल्क नीति में बदलाव को उसकी अर्थव्यवस्था को दोबारा औद्योगिक रूप से मजबूत बनाने और अपने बाजार तक पहुंच की शर्तें नए सिरे से तय करने की कोशिश से भी जोड़ा।
चीन के साथ रिश्ते सामान्य करने के लिए सीमा पर शांति जरूरी
भारत-चीन संबंधों पर जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों के बीच सीमा का औपचारिक निर्धारण नहीं हुआ है। यह विवाद कई दशकों से चला आ रहा है। उन्होंने बताया कि 1975 से 2020 तक सीमा पर किसी सैनिक की मौत नहीं हुई थी, लेकिन 2020 में सीमा पर हुए टकराव में दोनों पक्षों के सैनिक मारे गए।
विदेश मंत्री के मुताबिक, 2020 की घटनाओं ने 1975 के बाद से बनी स्थिति को गहराई से बदल दिया। सीमा पर शांति और स्थिरता प्रभावित होने के कारण द्विपक्षीय संबंधों पर भी असर पड़ा। हालात सामान्य करने के लिए चार साल से अधिक समय तक बातचीत करनी पड़ी।
उन्होंने कहा कि भारत का स्पष्ट रुख है कि अगर चीन के साथ संबंध सामान्य बनाने हैं, तो सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना जरूरी है। जयशंकर के अनुसार, 2024 से सीमा पर हालात में काफी सुधार हुआ है और इसके साथ ही दोनों देशों के संबंध भी सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं।
चीनी निवेश पर भारत का रुख क्या है?
भारत में चीनी निवेश की संभावनाओं से जुड़े सवाल पर जयशंकर ने कहा कि इस विषय पर बातचीत जारी है और भारत अलग-अलग संभावनाओं पर विचार कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत कारोबार करने के लिए सीमा विवाद का पूरी तरह समाधान होने की शर्त नहीं रख रहा है। भारत की अपेक्षा यह है कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनी रहे। निवेश, बाजार तक पहुंच और अन्य कारोबारी नीतियों से जुड़े फैसलों पर अलग से विचार किया जाएगा।
जयशंकर ने चीन के साथ व्यापार में असंतुलन का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन एकतरफा है। भारत के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्होंने दुनिया के दूसरे बाजारों में अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन उन्हें चीन में पर्याप्त बाजार पहुंच नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि भारत को चीन में कारोबार के लिए समान अवसर नहीं मिल रहे हैं, जबकि भारत ने चीनी कंपनियों को अपने बाजार में अवसर दिए हैं।
भारत-यूरोपीय संघ एफटीए पर क्या बोले विदेश मंत्री?
जयशंकर ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इस समझौते पर बातचीत में 25 साल लगे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इसे आने वाले महीनों में लागू किया जा सकेगा। उनके मुताबिक, यह इस साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत में संभव हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इस समझौते से भारत को यूरोप के बड़े और मजबूत क्रय क्षमता वाले बाजार तक पहुंच मिलेगी। भारत और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं में एक-दूसरे के पूरक बनने की क्षमता है।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की टिप्पणियों के संदर्भ में जयशंकर ने कहा कि वह यूरोप के साथ भारत के व्यापार समझौते को कार्नी के नजरिये से जोड़कर नहीं देखते। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा अपने संबंधों में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश की है।
जयशंकर ने कहा कि दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और यूरोप भी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर दे रहा है। भारत इस बदलाव को अपने दृष्टिकोण के अनुकूल मानता है।
रूस के चीन के करीब जाने पर भारत की क्या चिंता है?
रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता को लेकर जयशंकर ने कहा कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और यूरोप के संबंध काफी बिगड़ गए हैं। ऐतिहासिक रूप से रूस खुद को यूरोप का हिस्सा मानता रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में उसका रुख एशिया की ओर अधिक हुआ है। इस बदलाव में चीन की भूमिका भी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि भारत और दुनिया के हित में यह होगा कि रूस के पास एशिया में संबंधों के कई विकल्प हों। भारत इस मामले में एक स्वाभाविक विकल्प है, क्योंकि दोनों देशों के संबंध लंबे समय से स्थिर रहे हैं।
जयशंकर ने कहा कि भारत रूस के साथ अपने रिश्ते बनाए रखकर यह भरोसा दिला रहा है कि वैश्विक परिस्थितियां बदलने के बावजूद दोनों देशों के बीच वर्षों से बना सहयोग कायम है। उनके अनुसार, इन संबंधों ने एशिया में शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में योगदान दिया है।
एआई के लिए नियम और जवाबदेही जरूरी: जयशंकर
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के खतरों से निपटने के लिए वैश्विक नियमन की जरूरत पर जयशंकर ने कहा कि इस तकनीक की तुलना परमाणु तकनीक से करना पूरी तरह उचित नहीं होगा। परमाणु तकनीक का इस्तेमाल सीमित देशों और संस्थाओं तक रहा है, जबकि एआई का प्रभाव आम लोगों के दैनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि एआई पर चर्चा अक्सर चिप, कंप्यूटिंग क्षमता, ऊर्जा, पानी और वित्तपोषण जैसे संसाधनों पर केंद्रित रहती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस तकनीक का इस्तेमाल लोगों के जीवन में किस तरह होगा और इसके क्या परिणाम सामने आएंगे।
जयशंकर ने कहा कि लोकतांत्रिक देशों में एआई का राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर पड़ने वाला प्रभाव भी चिंता का विषय है। भारत में इस बात को लेकर व्यापक सहमति है कि एआई के लिए नियम और सुरक्षा मानक होने चाहिए। उन्होंने जिम्मेदारी के साथ तकनीक के इस्तेमाल पर गंभीर चर्चा करने और इसे आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक, एआई ऐसी तकनीक होनी चाहिए जिसका लाभ सभी लोगों तक पहुंचे, न कि इसका नियंत्रण केवल उन ताकतों के पास रहे जिन पर आम लोगों का कोई प्रभाव नहीं है।