अभी पूरी दुनिया के छोटे बड़े तमाम देशों में यही आम धारणा है कि अमेरिका बहुत ताकतवर है। वह अपनी दखलंदाजी से दुनिया को चलाने का दमखम रखता है। लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध के दौरान या बाद में इस बात का भी फैसला हो जाएगा कि अमेरिका की बादशाहत अब वास्तव में पूरी दुनिया में है या उसकी पकड़ कमजोर हो रही है। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है इस पूरे युद्ध में निश्चित तौर पर यूक्रेन को सबसे भारी नुकसान हो रहा है लेकिन असली परीक्षा तो अमेरिका की ही है और शुरुआती दौर में इस बात का अहसास हो रहा है कि यूक्रेन पर हुआ हमला अमेरिका की कमजोर पड़ती हुई ताकत का ही एक उदाहरण है।
प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं दुनिया के कई ताकतवर मुल्क हमेशा से अपने पड़ोस के देशों में युद्ध जैसी स्थितियों में रहे हैं। लेकिन एक आशंका और एक डर बना रहता था कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका कहीं कमजोर देशों के साथ खड़ा होकर युद्ध के हालातों में नतीजे ना बदल दे। लेकिन रूस और यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका को लेकर बने सभी ताकतवर देशों में उसके कमजोर होने का संदेश निश्चित तौर पर जाएगा। वह कहते हैं यूक्रेन पर हुआ हमला अमेरिका की कमज़ोर हो रही ताकत का उदाहरण भी है।
पूर्व राजनयिक डीपी देशपांडे कहते हैं कि यूक्रेन और रूस के युद्ध को सिर्फ इन दो देशों तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता है। क्योंकि इसके परिणाम सिर्फ यूक्रेन और रूस को ही नहीं भुगतने होंगे बल्कि इससे उपजे दूसरे हालात दुनिया के कई मुल्कों को युद्ध के मैदान में ढकेल देंगे। देशपांडे कहते हैं कि यह बात बिल्कुल सच है कि 2008 के बाद अमेरिका तमाम तरह के वित्तीय संकटों में उलझा रहा। यही वजह है कि उसकी ताकत कहीं न कहीं कमजोर भी हुई। जबकि इसी दौरान चीन बहुत मजबूती के साथ उभरकर बड़ी अर्थव्यवस्था बनने लगा। पूरी दुनिया में अगर आप अमेरिका रूस और चाइना को देखेंगे तो रूस की अर्थव्यवस्था और हालात चीन और अमेरिका के मुकाबले कमज़ोर स्तर पर हैं। लेकिन जिस तरीके से रूस ने अमेरिकी ताकत और नाटो जैसे संगठनों के हस्तक्षेप को दरकिनार करते हुए यूक्रेन पर हमला किया है उससे न सिर्फ नाटो जैसे संगठनों की मौजूदगी बल्कि अमेरिका की बादशाहत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विदेशी मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर अभिषेक सिंह कहते हैं कि इस पूरे मामले में चीन को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उनका कहना है कि बीते काफी वक्त से चीन ताइवान पर हमले का माहौल बनाए हुए है। वह कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम संधियों और तमाम दबावों के चलते चीन ताइवान पर हमला नहीं कर रहा था। उनका कहना है रूस और यूक्रेन के युद्ध के बाद चीन और ताइवान में युद्ध होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। इसके पीछे की वजह बताते हुए प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं कि चीन को इस बात का अंदाजा है कि अमेरिका जैसी ताकत जब यूरोप में दखल नहीं दे सकती है, तो एशिया में आकर वह कितना दखल देगी। इसके अलावा सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि अन्य ताकतवर देश भी इस बात को मानेंगे की तमाम मदद के वायदों के बाद भी अमेरिका अगर यूक्रेन की मदद नहीं कर पाया तो अन्य मुल्कों के साथ कैसे और क्यों खड़ा होगा।
विदेशी मामलों के जानकार और पूर्व विदेश सेवा के अधिकारी डॉक्टर विजय चंद्रा कहते हैं कि हकीकत में अमेरिका बीते कुछ सालों से सिर्फ दलीलें और पुरानी ताकत का रुआब दिखाकर ही पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व कायम रखने की फिराक में लगा हुआ था। वे कहते हैं कि निश्चित तौर पर यह वक्त अमेरिका के लिए भी एक बड़ी परीक्षा के समान है। हालांकि उनका कहना है कि कोई भी देश सीधे तौर पर किसी मुल्क की लड़ाई के लिए न तो अपने सैनिक भेजता है और न ही अपने संसाधनों के इस्तेमाल की अनुमति देता है। वे कहते हैं इसके लिए बाकायदा पहले से संधियां और समझौते होते हैं। यूक्रेन और रूस के मामले में उनका कहना है कि अमेरिका ने यूक्रेन को आश्वासन तो जरूर दिया था, लेकिन उसको बचाने जैसी कोई संधि या प्रस्ताव कभी नहीं रहा कि अगर यूक्रेन पर कोई मुल्क हमला करेगा तो यूक्रेन की तरफ से अमेरिका युद्ध लड़ेगा। विजय चंद्रा कहते हैं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा कि उन्हें दुनिया का कोई मुल्क सपोर्ट नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा यूक्रेन को रूस से लड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है। उनके साथ इस वक्त दुनिया का कोई देश खड़ा नहीं है।