राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शीर्ष नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं किया और सुरेश राव जोशी (भैया जी जोशी) को लगातार चौथी बार सरकार्यवाह चुन लिया गया। भैया जी जोशी संघ के उन निष्ठावान लोगों में हैं, जिनकी कुशल सूझ-बूझ ने आरएसएस के कई नए मानदंडों को तय किया है।
माना यह जा रहा है कि भैया जी जोशी के खराब स्वास्थ्य और उनके द्वारा खुद भी अनिच्छा जाहिर करने के बाद भी भावी चुनौतियों को देखकर अन्य विकल्पों पर विचार की बजाय उनके नाम पर मुहर लगी है।
भैया जी जोशी संघ की उस केन्द्रीय सोच के खांचे में बिल्कुल फिट बैठते हैं जहां व्यक्ति को मिला पद महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि उसे दी गई भूमिका (जिम्मेदारी) अहम है। संभवत: यही वजह है कि करीब एक दशक से भैया जी जोशी के प्रयासों से न केवल संघ का लगातार देश में प्रभाव बढ़ा है, बल्कि अनुषांगिक संगठनों के साथ मिलकर इसने अपना प्रचार, प्रसार भी बढ़ाया है।
उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम भारत तथा विदेशों में अपनी पकड़ मजबूत की है। संघ को करीब से जानने वाले और उसकी सेवा में अपना जीवन खपा देने वाले सूत्र के अनुसार एक के बाद एक राज्यों में भाजपा की सरकार, संघ और भाजपा में बेहतर तालमेल भी बहुत कुछ साबित कर रहा है। इसमें भैया जी जोशी की अहम भूमिका रही है।
कौन थे भैया जी जोशी के विकल्प
यह एक कयास ही साबित हुआ कि भैया जी जोशी संघ के सरकार्यवाह पद से मुक्त हो जाएंगे। उनका स्थान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से आने वाले दत्तात्रेय हसबोले ले लेंगे। दत्तात्रेय हसबोले के अलावा सुरेश सोनी और डा. कृष्ण गोपाल भी विकल्प के रुप में चर्चा में थे। चौथे सह सरकार्यवाह वी भागैय्या हैं, लेकिन वह इस दौड़ में नहीं गिने जा रहे थे।
हालांकि दत्तात्रेय हसबोले के नाम को लेकर संघ के अंदरुनी सूत्र बहुत आश्वस्त नहीं थे। उनका मानना था कि दत्तात्रेय हसबोले के सरकार्यवाह बनने के बाद संघ में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रभाव काफी बढ़ जाना तय था। दत्तात्रेय न केवल प्रधानमंत्री के करीबी माने जाते हैं, बल्कि उनके नीतियों, कार्यप्रणाली के उन्मुक्त समर्थकों में गिने जाते हैं। ऐसे में संघ के अनुषांगिक संगठनों, नेताओं, तथा प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली से कुछ हद तक विरोध रखने वालों के लिए मुश्किल बढ़ सकती थी।
माना यह जा रहा है कि इन लोगों के मुखर विरोध की संभावना को देखते हुए दत्तात्रेय हसबोले के नाम का प्रस्ताव नहीं हो सका। इसी तरह की स्थिति सुरेश सोनी के साथ भी है। उनको लेकर कुछ और भी पेचीदगियां थी। डा. कृष्ण गोपाल के नाम को लेकर इस तरह की समस्या नहीं थी लेकिन उनके नाम को सरकार्यवाह पद के लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा था।