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संघ के सामने खड़ी चुनौती के खेवनहार बनेंगे भैया जी जोशी

Sun, 11 Mar 2018 01:28 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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भैयाजी जोशी
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शीर्ष नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं किया और सुरेश राव जोशी (भैया जी जोशी) को लगातार चौथी बार सरकार्यवाह चुन लिया गया। भैया जी जोशी संघ के उन निष्ठावान लोगों में हैं, जिनकी कुशल सूझ-बूझ ने आरएसएस के कई नए मानदंडों को तय किया है।
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माना यह जा रहा है कि भैया जी जोशी के खराब स्वास्थ्य और उनके द्वारा खुद भी अनिच्छा जाहिर करने के बाद भी भावी चुनौतियों को देखकर अन्य विकल्पों पर विचार की बजाय उनके नाम पर मुहर लगी है। 

भैया जी जोशी संघ की उस केन्द्रीय सोच के खांचे में बिल्कुल फिट बैठते हैं जहां व्यक्ति को मिला पद महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि उसे दी गई भूमिका (जिम्मेदारी) अहम है। संभवत: यही वजह है कि करीब एक दशक से भैया जी जोशी के प्रयासों से न केवल संघ का लगातार देश में प्रभाव बढ़ा है, बल्कि अनुषांगिक संगठनों के साथ मिलकर इसने अपना प्रचार, प्रसार भी बढ़ाया है।
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उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम भारत तथा विदेशों में अपनी पकड़ मजबूत की है। संघ को करीब से जानने वाले और उसकी सेवा में अपना जीवन खपा देने वाले सूत्र के अनुसार एक के बाद एक राज्यों में भाजपा की सरकार, संघ और भाजपा में बेहतर तालमेल भी बहुत कुछ साबित कर रहा है। इसमें भैया जी जोशी की अहम भूमिका रही है।

कौन थे भैया जी जोशी के विकल्प 

यह एक कयास ही साबित हुआ कि भैया जी जोशी संघ के सरकार्यवाह पद से मुक्त हो जाएंगे। उनका स्थान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से आने वाले दत्तात्रेय हसबोले ले लेंगे। दत्तात्रेय हसबोले के अलावा सुरेश सोनी और डा. कृष्ण गोपाल भी विकल्प के रुप में चर्चा में थे। चौथे सह सरकार्यवाह वी भागैय्या हैं, लेकिन वह इस दौड़ में नहीं गिने जा रहे थे।

हालांकि दत्तात्रेय हसबोले के नाम को लेकर संघ के अंदरुनी सूत्र बहुत आश्वस्त नहीं थे। उनका मानना था कि दत्तात्रेय हसबोले के सरकार्यवाह बनने के बाद संघ में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रभाव काफी बढ़ जाना तय था। दत्तात्रेय न केवल प्रधानमंत्री के करीबी माने जाते हैं, बल्कि उनके नीतियों, कार्यप्रणाली के उन्मुक्त समर्थकों में गिने जाते हैं। ऐसे में संघ के अनुषांगिक संगठनों, नेताओं, तथा प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली से कुछ हद तक विरोध रखने वालों के लिए मुश्किल बढ़ सकती थी।

माना यह जा रहा है कि इन लोगों के मुखर विरोध की संभावना को देखते हुए दत्तात्रेय हसबोले के नाम का प्रस्ताव नहीं हो सका। इसी तरह की स्थिति सुरेश सोनी के साथ भी है। उनको लेकर कुछ और भी पेचीदगियां थी। डा. कृष्ण गोपाल के नाम को लेकर इस तरह की समस्या नहीं थी लेकिन उनके नाम को सरकार्यवाह पद के लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा था। 
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क्या हैं सरकार्यवाह के मायने

मोहन भागवत और भैयाजी जोशी - फोटो : अमर उजाला
सरकार्यवाह के मायने

सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शीर्ष पद होता है। सरसंघचालक के बाद सरकार्यवाह का होता है। सरकार्यवाह के साथ चार सह सरकार्यवाह होते हैं। सरसंघ चालक मार्गदर्शक, पथ प्रदर्शक की भूमिका में होता है। मौजूदा सरकार्यवाह मोहन भागवत हैं। संघ के परंपरा के मुताबिक वह संघ की रोजमर्रा की गतिविधयों में हस्तक्षेप नहीं करते। अनुषांगिक संगठनों से लेकर रोज की गतिविधियां सरकार्यवाह संभालते हैं।

ऐसे में सरकार्यवाह की भूमिका काफी बड़ी होती है। उसका कार्य सभी संगठनों में संतुलन बनाना, भावी चुनौतियों को देखते हुए कार्यकर्ताओं, प्रचारकों, स्वयं सेवकों को सक्रिय बनाए रखना है। माना यह जा रहा है कि भैया जी जोशी को लेकर उनके आलोचक चाहे जो कहें, लेकिन काफी हद तक वह अपनी भूमिका के निर्वाह में सफल रहे हैं। 

क्या है बड़ी चुनौती 

आरएसएस के सामने लगातार चुनौती बढ़ रही है। समय के हिसाब से संघ अपने तेवर भी बदल रहा है। यह एक रचनात्मक सामाजिक संगठन है। भाजपा मौजूदा समय में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी है। न केवल केन्द्र में बल्कि डेढ़ दर्जन से अधिक राज्यों में भाजपा और उसके सहयोग से राज्य सरकारों का गठन हुआ है। जहां भाजपा का प्रचार, प्रसार बढ़ रहा है, वह संघ का प्रसार बढ़ रहा है। 

वहीं विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय मजदूर संघ समेत कुछ संगठन भी हैं। ये संगठन संघ के अनुषांगिक संगठन हैं और केन्द्र की भाजपा सरकार की नीतियों से तंग हैं। आंतरिक द्वंद की स्थिति भी लगातार बढ़ रही है। इसी कड़ी में अगले साल देश में लोकसभा चुनाव भी होने हैं।

संघ को जानने वाले सूत्रों का कहना है कि इस चुनाव में सफलता बिना संघ और संघ के प्रचारकों विभागों, अनुषांगिक संगठनों और भाजपा की एकता के बिना संभव नहीं है। इसका असर आरएसएस पर भी पड़ना तय है। इसलिए संघ के निष्ठावान पदाधिकारी, प्रचारक और यहां तक कि सरसंघ चालक मोहन भागवत भी कोई बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहते। 
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