आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबोले ने आज के समय में बाजार केंद्रित जीवनशैली में लगातार हो रही है बढ़ोतरी पर चर्चा किया। उन्होंने कहा कि ई-कॉमर्स और बाजार केंद्रित जीवनशैली से समाज में रिश्ते सिर्फ लेन-देन तक सिमटते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पारंपरिक विश्वास और संबंध खत्म हो रहे हैं, जो सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरनाक संकेत हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने मंगलवार को बाजार केंद्रित जीवनशैली से कमजोर होते समाजिक रिश्ते की बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बाजार केंद्रित जीवनशैली और ई-कॉमर्स जैसी व्यवस्थाएं समाज के पारंपरिक रिश्तों को नुकसान पहुंचा रही हैं और इंसानी संबंधों की बुनियाद को बदल रही हैं। नई दिल्ली में इंटीग्रल ह्यूमनिज्म: ए डिस्टिंक्ट पैराडाइम ऑफ डेवलपमेंट पुस्तक पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए होसबोले ने कहा कि भारत कभी कठोर विचारधाराओं का देश नहीं रहा, जो स्वतंत्र सोच को रोकती हों। हम दर्शन पर आधारित समाज हैं, ऐसी कठोर विचारधाराओं पर नहीं।
ऑनलाइन ऑर्डर का दिया उदाहरण
साथ ही होसबोले ने अमेरिका का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि वहां समाज लगभग समाप्त हो चुका है। केवल व्यक्ति और राज्य ही बचे हैं। उन्होंने चेताया कि सरकार-निर्भर और बाजार-आधारित जीवन सामाजिक संतुलन के लिए खतरनाक हो सकता है।
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प्रकृति और शिक्षा पर भी जताई चिंता
होसबोले ने कहा कि बिजली के बिना जीवन संभव नहीं, लेकिन यह सोचना होगा कि इसे पर्यावरण के अनुकूल तरीके से कैसे उत्पन्न किया जाए। शिक्षा केवल जानकारी देने तक सीमित न हो, उसमें जीवन-मूल्यों की शिक्षा भी दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी सोच व्यक्ति के अधिकार, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ और प्रकृति के दोहन पर आधारित है, जबकि भारत की सोच करुणा, सह-अस्तित्व और समर्पण पर आधारित है। बुद्ध, महावीर और स्वामी विवेकानंद विचारक थे, विचारधारा से परे थे।