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RSS 100 Years: मोहन भागवत ने गढ़े आरएसएस के नए आदर्श, हर बड़ी समस्या का समाधान दे गए संघ प्रमुख

सार

आरएसएस के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिल्ली के विज्ञान भवन में मोहन भागवत ने विशेष संबोधन दिया। इस संबोधन में उन्होंने आम लोगों के बीच संघ को लेकर स्थापित कई धारणाओं पर स्पष्टता देने की कोशिश की।
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मोहन भागवत - फोटो : PTI
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विस्तार
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने संघ को एक नई परिभाषा में ढालने का प्रयास किया है। इस नए संघ में अखंड हिंदू राष्ट्र की पारंपरिक सोच तो है, लेकिन पाकिस्तान-बांग्लादेश के प्रति कोई दुराग्रह नहीं है। इसके उलट नया संघ पाकिस्तान-बांग्लादेश जैसे पड़ोसियों के साथ एक बेहतर संबंध बनाने का हिमायती है। इस नए संघ में हिंदुओं की एकता के प्रति आग्रह तो है, लेकिन मुसलमानों को लेकर कोई दुराग्रह भी नहीं है। मोहन भागवत मुसलमानों को भी हिंदुओं के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते हुई दिखाई दे रहे हैं। 
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उनके इस नए संघ में संस्कृत और हिंदी को लेकर विशेष प्रेम तो है, लेकिन किसी भाषा के प्रति कोई पूर्वाग्रह भी नहीं है। वे हर भारतीय भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मान देते हुए दिखाई दे रहे हैं। मोहन भागवत का यह नया संघ आरएसएस के नए जमाने के हिसाब से बदलने की घोषणा तो कर ही रहा है, वह समकालीन कई बड़ी चुनौतियों का गंभीर सकारात्मक समाधान भी प्रस्तुत करता हुआ दिखाई दे रहा है। 

'अब्दुल कलाम चाहिए, विदेशी आक्रांता स्वीकार नहीं'
आरएसएस के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिल्ली के विज्ञान भवन में मोहन भागवत ने विशेष संबोधन दिया। इस संबोधन में उन्होंने आम लोगों के बीच संघ को लेकर स्थापित कई धारणाओं पर स्पष्टता देने की कोशिश की। सामान्य मुसलमानों के बीच संघ को लेकर यही सोच है कि वह उनके खिलाफ है। लेकिन संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि यदि संघ मुसलमानों के खिलाफ होता तो उन्हें अपने कार्यक्रमों में क्यों बुलाता?   
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उन्होंने कहा कि मुसलमान भी उतना ही हिंदू है, जितना कि कोई अन्य। 40 हजार वर्षों से भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक बताकर उन्होंने पूरे समाज को एकता के सूत्र में बांधने की ही कोशिश की है। इसमें मुसलमान भी शामिल हैं। उन्होंने साफ किया कि अब्दुल कलाम और अब्दुल हमीद के नाम पर शहरों-सड़कों के नाम स्वीकार्य हैं, लेकिन संघ विदेशी आक्रांताओं के नामों पर शहरों का नाम रखने का पक्षधर नहीं है।

मुसलमानों के मन में कोई गलतफहमी न हो, इसके लिए उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ अब राम मंदिर जैसा कोई आंदोलन नहीं चलाएगा। उन्होंने इस बात को दुहराया कि हर मस्जिद में शिवलिंग नहीं खोजा जाना चाहिए। हालांकि, मथुरा और काशी को लेकर उन्होंने कहा कि इन धार्मिक केंद्रों को लेकर हिंदू समाज की आस्थाएं जगजाहिर हैं। मुसलमानों को भी इन स्थानों को हिंदुओं को सौंप देने पर विचार करना चाहिए।   

एक बड़ा प्रश्न यही है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सच में बदल रहा है, या यह कोई राजनीतिक मजबूरी है जिसके कारण संघ को यह दिखावा करना पड़ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विजय त्रिवेदी ने अमर उजाला से कहा कि पूरी दुनिया में संघ और भाजपा को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। दोनों संगठन अपने आपको एक दूसरे से अलग भले ही कहें, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों संगठनों को एक ही संगठन का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुसलमानों के प्रति कोई नकारात्मक सोच रखता है तो इससे पूरी दुनिया में, विशेषकर मुस्लिम देशों में गलत संदेश जाता है। संघ या भारत आज इस स्थिति को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।

विजय त्रिवेदी ने कहा कि, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि संघ केवल दिखावे के लिए मुसलमानों से प्रेम कर रहा है। मुसलमान मतदाताओं के बिना व्यापक समर्थन के भी भाजपा ने केंद्र और राज्यों में कई बार सरकारें बनाई हैं। ऐसे में यदि केवल सरकार बनाने की बात है तो भाजपा के लिए मुसलमान वोटों पर निर्भरता बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन कहीं न कहीं संघ यह महसूस कर रहा है कि भारत का विकास और मजबूत स्थायित्व सबको साथ लेने में ही है। 

मोहन भागवत की ऐतिहासिक सोच
विजय त्रिवेदी ने कहा कि 1975 के लगभग नागपुर में संघ नेताओं की एक बड़ी बैठक थी। इस बैठक में बालासाहेब देवरस ने संघ में मुसलमानों का प्रवेश देने की बात की थी। लेकिन संघ पदाधिकारियों ने उनसे कोई सहमति नहीं जताई और उन्हें अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। इस दृष्टि से देखें तो जिस तरह सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुसलमानों को लेकर जिस तरह की बातें कही हैं, कहीं न कहीं वे अपने आपको बालासाहेब देवरस से आगे खड़ा करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

मोहन भागवत ने डेमोग्राफी चेंज को बड़ा खतरा बताया है। डेमोग्राफी बदलने के कारण कई देशों की भौगोलिक सीमाएं नई तरीके से खींचनी पड़ी हैं। इससे चिंतित मोहन भागवत ने हिंदू परिवारों से भी तीन बच्चे पैदा करने की बात कही है, लेकिन कई अन्य हिंदू नेताओं की तरह उन्होंने अधिक जनसंख्या के लिए मुसलमानों को ज्यादा बच्चे पैदा करने का जिम्मेदार नहीं बताया है। यह एक बड़ा बदलाव है।

हर बड़ी समस्या का समाधान दे गए मोहन भागवत
संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने लगभग सभी बड़ी समस्याओं का सामयिक और बहुत व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया है। दक्षिण और पश्चिम के राज्य अपनी भाषाओं के भविष्य को लेकर आशंकित हैं। उन्हें लगता है कि हिंदी को अधिक महत्त्व देने से उनकी भाषा का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। लेकिन मोहन भागवत ने स्पष्ट कर दिया कि सारी भाषाएं हमारी हैं और वे सभी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं।   

RSS-BJP के बीच विवाद को भी ध्वस्त कर गए भागवत
भाजपा-आरएसएस के बीच तनावपूर्ण संबंधों को मोहन भागवत ने यह कहकर इसे खारिज कर दिया है कि संघ दूसरे संगठनों में दखल नहीं देता। वे स्वयंसेवक देने का काम करते हैं, लेकिन स्वयंसेवक वहां जाकर किन परिस्थितियों में क्या निर्णय लेते हैं, इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहता है। हालांकि, जब उनसे राय मांगी जाती है तो वे अपनी राय अवश्य व्यक्त करते हैं। इसी कड़ी में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने में संघ की कोई भूमिका नहीं है। यदि भूमिका होती तो अध्यक्ष बनाने में इतनी देर न होती।

75 वर्ष पर विवाद छूटा पीछे, मोदी को हरी झंडी...?
इसी तरह 75 वर्ष की आयु में किसी के रिटायर होने की बात भी उन्होंने खारिज कर दी। उन्होंने साफ कर दिया कि यह एक पूर्व आरएसएस पदाधिकारी के बयान को पेश करने की बात थी। उन्होंने अपने बारे में भी यह नहीं कहा कि वे 75 वर्ष में रिटायर होने जा रहे हैं, या किसी अन्य को होना चाहिए।  

आरक्षण पर भी दोहराया मजबूत रुख
आरक्षण के मुद्दे पर मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि निचले वर्गों को मजबूत बनाने के लिए आरक्षण तब तक दिया जाना चाहिए जब तक कि वे स्वयं इसे लेने से इनकार न कर दें। उन्होंने यह गलतफहमी भी दूर करने की कोशिश की कि मनुस्मृति से कभी देश चलता था। उन्होंने कहा कि लोक व्यवहार इससे अलग चलता है। मनुस्मृति कभी पूरी तरह एक संविधान के रूप में स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने उसे सच्चा स्वयंसेवक नहीं माना जो दलितों-पिछड़ों के प्रति होने वाले अत्याचार को देखने के बाद भी चुप रहे। उन्होंने कहा कि दलितों-पिछड़ों के साथ उठने-बैठने, मिलने-जुलने और उन्हें सम्मान के साथ अपने साथ भागीदार बनाने से ही समाज की दूरी घटेगी। 

नई सोच का प्रतीक बनकर उभरे मोहन भागवत- तरुण विजय
पांचजन्य के पूर्व संपादक तरुण विजय ने अमर उजाला से कहा कि मोहन भागवत ने संघ को पूरी तरह नए तरीके से परिभाषित करने का काम किया है। उनके इस संबोधन के बाद बहुत सारे लोगों के मन में संघ को लेकर जो चिंताएं थीं, वे दूर हो गई होंगी। उन्होंने कहा कि मोहन भागवत ने यह स्वीकार किया है कि दलित-पिछड़ी जातियों को मजबूत करने और समाज में समता लाने के लिए आरक्षण रहना चाहिए। बालासाहेब देवरस ने कहा था कि यदि अश्पृश्यता पाप नहीं है तो कुछ भी पाप नहीं है। मोहन भागवत ने इसी बात को आगे बढ़ाकर भारतीय समाज की एक बड़ी कुरीति को दूर करने की कोशिश की है। 

तरुण विजय ने कहा कि सरसंघचालक ने राष्ट्र प्रेम को भी आगे बढ़ाने का काम किया है। उन्होंने कहा कि कभी देश के लिए मरना राष्ट्र भक्ति का प्रमाण होता था, लेकिन आज देश के लिए जीना और उसके लिए कुछ करना राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है। राष्ट्रभक्ति के संदर्भ में यह एक बड़ी सोच है। उनके अनुसार, मोहन भागवत ने यह सिद्ध किया कि संघ बुद्ध और गांधी के सिद्धांतों को आगे बढ़ाकर समाज में समता और विकास लाना चाहता है। यह बुद्ध का ही विचार है कि आज वे पाकिस्तान-बांग्लादेश के साथ परस्पर प्रेम संबंध बनाकर सबके कल्याण और सबके विकास की बात कर रहे हैं। 

महिलाओं को लेकर कोई भेदभाव नहीं
भागवत ने बताया कि संघ महिलाओं को अपने अंदर प्रवेश देने को लेकर कतई नकारात्मक रुख नहीं अपना रहा है। उन्होंने कहा कि संघ में महिलाओं का प्रवेश तो लंबे समय पहले ही हो चुका है। महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति का गठन 1936 में ही कर दिया गया था। यह बखूबी काम भी कर रहा है। दोनों संगठनों में परस्पर सहयोग भी है। यदि कभी राष्ट्र सेविका समिति आरएसएस के अंदर महिलाओं की सीधी भागीदारी को लेकर बात करेगा तो उस पर विचार किया जा सकता है। 

मोहन भागवत की नई दृष्टि ऐतिहासिक- हितेश शंकर
पांचजन्य के वर्तमान संपादक हितेश शंकर ने अमर उजाला से कहा कि सरसंघचालक मोहन भागवत का संबोधन देश की सभी समस्याओं पर नई दृष्टि पेश करने वाला था। यह संबोधन कई अर्थों में ऐतिहासिक था क्योंकि इसने संघ के बारे में लोगों के बीच व्याप्त कई धारणाओं को ध्वस्त करने और संघ के लिए नए उद्देश्य गढ़ने का काम किया है। इससे संघ के बारे में लोगों की समझ बेहतर होगी। 

हितेश शंकर ने कहा कि भारतीय समाज हमेशा से वसुधैव कुटुंबकम की भावना को लेकर आगे चलता रहा है। मोहन भागवत के संबोधन में भी वही बात दिखाई पड़ी और वे दुनिया के हर वर्ग को किसी न किसी दृष्टि में अपना हिस्सा समझकर उसके भी कल्याण और विकास की बात करते हुए दिखाई पड़े हैं। हर देश में हिंदू स्वयंसेवक संघ इसी भावना को आगे बढ़ा रहा है।
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