सेवाओं पर नियंत्रण संबंधी केंद्र सरकार के अध्यादेश के खिलाफ दायर की गई दिल्ली सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लिए कानून बनाने की संसद की शक्ति की रूपरेखा का अध्ययन करेगी। यह भी जांच की जाएगी कि क्या केंद्र सरकार सेवाओं पर नियंत्रण छीनने के लिए कानून बनाकर शासन के सांविधानिक सिद्धांतों को निरस्त कर सकती है।
दिल्ली सरकार के सेवाओं पर नियंत्रण के लिए तीन सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले के आठ दिन बाद केंद्र सरकार ने 19 मई को राष्ट्रीय राजधानी से संबंधित संविधान के एक विशेष प्रावधान अनुच्छेद 239-एए के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करके दिल्ली सेवाओं के मामले पर एक अध्यादेश जारी किया था। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को अपने 10 पेज के आदेश में अध्यादेश को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेज दिया था। अब संविधान पीठ के सामने दो बड़े कानूनी प्रश्न हैं।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ द्वारा पारित आदेश में कहा गया है, हम तदनुसार निम्नलिखित प्रश्नों को संविधान पीठ के पास भेजते हैं:- पहला प्रश्न यह है कि अनुच्छेद 239-एए(7) के तहत कानून बनाने की संसद की शक्तियों की सीमाएं क्या हैं? और दूसरा क्या संसद अनुच्छेद 239-एए(7) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (एनसीटीडी) के लिए शासन के संवैधानिक सिद्धांतों को निरस्त कर सकती है?
पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन पर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच लंबी कानूनी लड़ाई को खत्म करने की जरूरत है। साथ ही पीठ ने शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को संदर्भित कानूनी सवालों के जवाब देने के लिए संविधान पीठ की स्थापना के लिए प्रशासनिक पक्ष में मामले के कागजात सीजेआई के समक्ष रखने का निर्देश दिया। सीजेआई द्वारा लिखे गए आदेश में कहा गया है कि दो प्रारंभिक मुद्दे थे जो एक बड़ी पीठ द्वारा विचार के लिए उठाए गए हैं।
आदेश में कहा गया है, पहला मुद्दा (अध्यादेश की) धारा-3ए को शामिल किए जाने से संबंधित है। धारा-3ए एनसीटीडी की विधायी शक्तियों से सूची दो (राज्य सूची) की प्रविष्टि 41 (सेवाएं) को हटाती है। एनसीटीडी की विधायी शक्तियों से प्रविष्टि 41 को हटाए जाने से एनसीटीडी की सरकार के पास सेवाओं पर कार्यकारी शक्ति नहीं रह जाती, क्योंकि कार्यकारी शक्तियां विधायी शक्तियों के समान होती हैं।
आदेश के मुताबिक, मुद्दा यह है कि क्या कोई कानून सेवाओं पर दिल्ली सरकार की कार्यकारी शक्तियों को पूरी तरह से हटा सकता है। इसमें कहा गया है कि प्रविष्टि 41 के तहत सेवाओं का पहलू भी अध्यादेश की धारा-3ए की वैधता के साथ जुड़ा हुआ है। दिल्ली सरकार की याचिका को संविधान पीठ के पास भेजते हुए पीठ ने दिल्ली सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया था कि मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इसके लंबित रहने के दौरान पूरी व्यवस्था पंगु बन जाएगी।
पीठ ने गुरुवार को अध्यादेश के संबंध में सवाल उठाया और कहा कि इसने दिल्ली सरकार से सेवाओं का नियंत्रण छीन लिया है। उसने कहा कि संविधान पुलिस, कानून-व्यवस्था और जमीन से संबंधित सूची दो (राज्य सूची) की तीन प्रविष्टियों को दिल्ली सरकार के नियंत्रण से बाहर रखता है। पीठ ने कहा, आपने (केंद्र) संविधान में की गई इस व्यवस्था पर प्रभावी ढंग से अमल किया है कि तीन प्रविष्टियों को छोड़कर, सभी मामलों में दिल्ली विधानसभा के पास शक्ति है। लेकिन, अध्यादेश (सूची दो की) प्रविष्टि 41 (सेवाओं) को भी शक्तियों से छीन लेता है। यह अध्यादेश की धारा-3ए का नतीजा है।
पीठ ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं पर नियंत्रण संबंधी अध्यादेश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए दिल्ली सरकार की याचिका पर केंद्र और दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना को नोटिस जारी किया था। अनुच्छेद-239एए संविधान में दिल्ली के संबंध में विशेष प्रावधानों से संबंधित है और इसके उप-अनुच्छेद 7 में कहा गया है, संसद कानून के माध्यम से पूर्वगामी खंडों में निहित प्रावधानों को प्रभावी या पूरक बनाने के लिए और सभी प्रासंगिक या महत्वपूर्ण मामलों के संबंध में प्रावधान कर सकती है।
अनुच्छेद-239एए यह भी कहता है कि इसके तहत बनाए गए ऐसे किसी भी कानून को अनुच्छेद-368 के उद्देश्यों के लिए संविधान में संशोधन नहीं माना जाएगा, भले ही उक्त कानून में कोई ऐसा प्रावधान शामिल हो, जो संविधान में संशोधन करता हो या संशोधन करने का प्रभाव रखता हो। केंद्र सरकार ने दिल्ली में ग्रुप-ए अधिकारियों की तैनाती और स्थानांतरण के लिए एक प्राधिकरण बनाने के वास्ते 19 मई को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश-2023 जारी किया था।