अमर उजाला ने अपनी यात्रा के 25 वर्ष पूर्ण कर आज रजत जयंती वर्ष में प्रवेश किया है। किसी नवोदित राष्ट्र के लिए 25 वर्ष का समय बाल अवस्था होती है। व्यक्ति 25 वर्ष में जवान हो जाता है। एक समाचार पत्र से 25 वर्ष पूरे करने पर प्रौढ और परिपक्व अवस्था की अपेक्षा की जा सकती है। 'अमर उजाला' इस कसौटी पर कहां तक खरा उतरता है इसका निर्णय पाठकवृंद को करना है। 'अमर उजाला' का जन्म राजनीतिक क्रांति और राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि से हुआ। 18 अप्रैल, 1948 को इसके प्रथम संपादकीय में इन पंक्तियों के लेखक ने निवेदन किया था कि 'अमर उजाला' जवाहरलाल नेहरू की नीतियों और दर्शन को अपने चिंतन का आधार बनायेगा।
जवाहरलाल नेहरू न केवल हमारे राष्ट्रीय हीरो बल्कि हमारे राष्ट्र के सबसे बड़े और महान शिक्षक थे। एक नेता और एक व्यक्ति से अधिक वह जीवन के कुछ मूल्यों के प्रतीक थे। देश में लोकतंत्र, आर्थिक एवं सामाजिक स्वतंत्रता के और विदेशी मामलों में पंचशील के पांच सिद्धांतों के। "स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है" के मंत्र को विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष के लिए भारतीय जन-जन ने धर्म-भाव से ग्रहण किया। स्वतंत्रता संग्राम में हमारे लाखों देशवासियों ने भाग लिया, बेशुमार लोगों ने कष्ट सहन किये और अनेक ने अपने प्राणों की आहुति दी।
अनेक क्रांतिकारियों एवं स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने समाचार पत्रों का भी प्रकाशन किया और उनको जन-जागरण का माध्यम बनाया। इन समाचार पत्रों और उनसे संबद्ध लोगों ने जो देशभक्तिपूर्ण और साहसिक भूमिका प्रस्तुत की वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी। संघर्ष काल के पत्रों ने जहां विदेशी सत्ता के विरुद्ध मोर्चा लगाने का वातावरण बनाया वहीं स्वतंत्रता के बाद जन्मे पत्रों के समक्ष स्वतंत्रता से जनित प्रश्न थे, आर्थिक एवं सामाजिक क्रांति के लिए सामाजिक शक्ति के निर्माण में भागीदार होने का अवसर इन्हें था। इनको वातावरण स्वछन्द मिला और इनके समक्ष वे जोखिम न थे जिनका संघर्ष काल के समाचार पत्रों को सामना करना पड़ा, यद्यपि कठिनाइयां इनके समक्ष भी कम न थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही लाखों शरणार्थियों के आगमन और राष्ट्रपिता गांधीजी की हत्या से जनित क्रोध के वातावरण ने हमारे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नवोदित समाचार पत्रों की परीक्षा शुरू के वर्षों में ही ले ली थी। जिन लोगों और जिन पत्रों और उनके संचालकों की पृष्ठभूमि और संस्कार राष्ट्रीय आंदोलन से प्रभावित थे उन्होंने इस वातावरण में "जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजे" के अनुसार चलने से इन्कार कर दिया और क्रुद्ध वर्ग की विचारधारा का विरोध करते हुए उनका डटकर मुकाबला किया। 'अमर उजाला' को यह श्रेय है कि इस प्रचंड तूफान में वह राष्ट्रीय आदर्शों एवं सिद्धांतों के पक्ष में खड़ा रहा और क्रुद्ध वर्ग की धमकियों के समक्ष झुकने से इसने इन्कार कर दिया।
बाद के तमाम वर्षों में समाचार पत्रों विशेषकर भाषायी समाचार पत्रों की भूमिका एक ओर जन साधारण को राष्ट्रीय आदर्शों एवं उद्देश्यों के प्रति चैतन्य एवं शिक्षित करने और दूसरी ओर लोकतंत्रीय प्रक्रिया के कार्यान्वयन में जनहितों का प्रतिनिधित्व करने की ही हो सकती थी। 'अमर उजाला' ने इस दिशा में सतत् सचेष्ट रहने का अकिंचन प्रयास किया है। जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विध्वंस और विस्फोटों की राजनीति की कायल थी तब 'अमर उजाला' उस पंक्ति में था, जिन्होंने उस विध्वंसक राजनीति का विरोध किया और उसके मुकाबले शांतिपूर्ण लोकतंत्रीय परिवर्तन की प्रक्रिया की वकालत की।