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रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में जांच जारी: ED ने कोर्ट में दाखिल की स्टेटस रिपोर्ट, मांगा और समय

Fri, 21 Aug 2026 12:00 PM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े गुरुग्राम के शिकोहपुर जमीन मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत को बताया कि जांच अभी पूरी नहीं हुई है। एजेंसी ने डीएलएफ से संबंधित पहलुओं की पड़ताल जारी होने की जानकारी देते हुए दस्तावेजों की सूची तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। अदालत ने ईडी की मांग स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई सितंबर में तय की है।
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डीएलएफ की भूमिका की जांच कर रही ईडी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े शिकोहपुर जमीन सौदे में मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने राउज एवेन्यू कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। ईडी ने कहा कि जांच पूरी करने के लिए उसे कुछ और समय की जरूरत है।
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ईडी ने अदालत को बताया कि शिकोहपुर जमीन सौदे में डीएलएफ की भूमिका से जुड़े मामले की जांच जारी है। इस बीच, जांच एजेंसी ने आरोपियों को संबंधित दस्तावेज उपलब्ध करा दिए हैं।

डेढ़ दशक पुराना है शिकोहपुर जमीन सौदे का मामला
ईडी ने दस्तावेजों की सूची उपलब्ध कराने के लिए अदालत से तीन सप्ताह का समय मांगा। एजेंसी ने कहा कि मामले की जांच अभी जारी है। अदालत ने ईडी को समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 सितंबर की तारीख तय की है।
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रॉबर्ट वाड्रा से जुड़ा गुरुग्राम के शिकोहपुर जमीन सौदे का मामला करीब डेढ़ दशक पुराना है। अब यह मामला प्रवर्तन निदेशालय की मनी लॉन्ड्रिंग जांच और अदालत की कार्रवाई के कारण फिर चर्चा में है। अप्रैल 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने ED की ओर से दाखिल अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेते हुए वाड्रा और अन्य आरोपियों के खिलाफ आगे की कार्यवाही के लिए पर्याप्त सामग्री होने की बात कही।

पूरा मामला क्या है?
मामला गुरुग्राम के शिकोहपुर गांव में करीब 3.53 एकड़ जमीन से जुड़ा है। फरवरी 2008 में रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने यह जमीन ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी थी। ईडी का आरोप है कि जमीन की खरीद के समय बिक्री दस्तावेज में भुगतान को लेकर गलत जानकारी दी गई थी। एजेंसी के मुताबिक, जिस चेक से भुगतान दिखाया गया था, वह दूसरी कंपनी से जुड़ा था और उसे कभी भुनाया ही नहीं गया।

ईडी ने लगाए क्या आरोप?
इसके बाद जमीन के इस्तेमाल के लिए वाणिज्यिक लाइसेंस की प्रक्रिया हुई। ईडी का आरोप है कि नियमों को दरकिनार करते हुए लाइसेंस दिलाने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया गया। जमीन का लाइसेंस और विकास की संभावनाएं बढ़ने के बाद उसकी कीमत में काफी इजाफा हुआ। जून 2008 में डीएलएफ ने इस जमीन को करीब 58 करोड़ रुपये में खरीदने पर सहमति जताई। यानी 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी गई जमीन की कीमत कुछ ही महीनों में कई गुना बढ़ गई।

ईडी का आरोप है कि DLF से प्राप्त 58 करोड़ रुपये अपराध से हुई आय यानी ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ थे। बाद में इस रकम को वाड्रा से जुड़ी कंपनियों के जरिए अलग-अलग संपत्तियों और वित्तीय देनदारियों में इस्तेमाल किया गया। ईडी ने पीएमएलए के तहत इसे मनी लॉन्ड्रिंग का मामला माना।

वाड्रा समेत पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ भी दर्ज हुई थी एफआईआर
मामले की शुरुआती जांच में 2012 में तत्कालीन IAS अधिकारी अशोक खेमका की ओर से जमीन के म्यूटेशन को लेकर आपत्ति और कार्रवाई भी सामने आई थी। बाद में 2018 में हरियाणा पुलिस ने वाड्रा, तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, DLF और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की। इसमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोप लगाए गए थे।

ईडी ने जुलाई 2025 में इस मामले में अभियोजन शिकायत दाखिल की थी। एजेंसी ने वाड्रा समेत कई लोगों और कंपनियों को आरोपी बनाया तथा उनसे जुड़ी 43 संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क करने की कार्रवाई भी की थी। वाड्रा की ओर से आरोपों को राजनीतिक प्रतिशोध बताया गया है।

अदालत में लंबित हैं तमाम मामले
ये सभी आरोप अभी अदालत में साबित होना बाकी हैं। 2023 में हरियाणा सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक हलफनामे में कहा था कि DLF को जमीन के हस्तांतरण में कोई नियम नहीं तोड़ा गया था। इसलिए मामले में ED के आरोप, बचाव पक्ष का पक्ष और अदालत की आगे की कार्यवाही—तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
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