1984 के सिख दंगों के बाद से अबतक दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, पटना और देश के तमाम शहरों में सिख आज भी खुद को किस तरह अजनबी सा महसूस करते हैं, ये उनसे मिलने पर जाहिर हो जाता है।
दरअसल नफरत के इस खेल में सियासत की भूमिका के बारे में कहते तो सब हैं, हर पार्टी और सरकार दंगामुक्त प्रदेश और भारत बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन चुनाव नजदीक आते ही वोटों के ध्रुवीकरण का ये खतरनाक खेल शुरू हो जाता है। चाहे वह रामनवमी के जुलूस के नाम पर हो या फिर मोहर्रम के जुलूस के नाम पर।
फिलहाल बिहार और पश्चिम बंगाल जल रहा है। बिहार के जेडीयू-भाजपा सरकार के मुखिया और सुशासन के लिए मशहूर नितीश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी कुछ बोलें न बोलें लेकिन भाजपा के दूसरे नेता और मंत्रीगण दंगों के लिए सीधे तौर पर कांग्रेस और खासकर राहुल और सोनिया गांधी को दोषी ठहरा कर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार में भागलपुर, मुंगेर, औरंगाबाद, नवादा से होते हुए दंगा तमाम शहरों में फैल रहा है।
ममता बनर्जी के बंगाल में आसनसोल, रानीगंज, मुर्शिदाबाद, दुर्गापुर जैसे शहर में हालात बिगड़े हैं। आरोप ये है कि रामनवमी के जुलूस और भड़काऊ नारेबाजी ने ऐसे हालात पैदा किए और खासकर पूरे देश में हिन्दू संगठनों के 18 फरवरी से 31 मार्च तक अलग अलग तरीके से मनाए जा रहे ‘राम महोत्सव’ और इसके जुलूस ने स्थिति बिगाड़ी। लेकिन इन जगहों पर शुरूआती दौर में न तो पुलिस हरकत में आई और न ही जिला प्रशासन।
हर बार दंगों के पीछे की एक ही कहानी होती है। पूरे इलाके तबाह होते हैं, सैकड़ों जानें जाती हैं, बस्तियां उजड़ जाती हैं, दिलों के फासले बढ़ जाते हैं, लोग पलायन को मजबूर होते हैं, देश के आम लोगों का ध्यान मूल समस्याओं से हटकर इस भावनात्मक खेल में उलझा दिया जाता है और फिर सिंकती है वोट की रोटी और शुरू होता है मरहम के नाम पर सियासत का घिनौना खेल।
विकास के एजेंडे पर चुनाव लड़ने और देश को डिजिटल बनाकर दुनियाभर में अपना परचम लहराने के खोखले दावे और विदेशी निवेश की कहानियां और खूबसूरत सपनों का देश बना देने वाले घोषणापत्रों का चुनावी खेल।