फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों में भी निजता की बात: सुप्रीम कोर्ट

Fri, 25 Aug 2017 10:57 AM IST
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली
विज्ञापन
supreme court
विज्ञापन
नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने केवल भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर इस नतीजे पर पहुंची है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है बल्कि उनका कहना है कि यह लोगों के जीवन और स्वतंत्रता के हर पहलू से जुड़ा हुआ है। पीठ ने कहा कि धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों में भी निजता केअधिकार को अहम बताया गया है। 
विज्ञापन


पीठ के तीसरे वरिष्ठ जज एसए बोबडे ने अपने लिखे फैसले में कहा कि धार्मिक और पौराणिक ग्र्रंथों में भी निजता के अधिकार को तव्वजो दी गई है। निजता की बात पुरातन कालों से चली आ रही है। उन्होंने रामायण, अर्थशास्त्र सहित अन्य में इस अधिकार को महत्व दिए जाने का हवाला दिया है। 

न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा है कि भारत की पुरातन और धार्मिक ग्रंथो में निजता की बात है। रामायण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस वक्त यह स्थापित व्यवस्था थी कि महिलाएं अंजान पुरुषों के सामने नहीं आती थी। वहीं चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ में कहा गया था कि बिना मालिक की अनुमति के कोई व्यक्ति उसके घर में दाखिल नहीं हो सकता। जबकि गृहसूत्र में यह बताया गया है कि किसी व्यक्ति को अपने घर का निर्माण के वक्त परिवार की निजता का ख्याल रखना होता था। 
विज्ञापन


पढ़ें- निजता नागरिक का मौलिक अधिकार- जानिए किस जज ने क्या कहा

घर के निर्माण के वक्त इस बात का ख्याल रखना होता था कि उसके परिवार की निजता का संरक्षण हो। साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाता था कि जब घर में कोई धार्मिंक आयोजन हो रहा हो या वेद पाठ चल रहा हो, उसे संरक्षित किया जा सके। इतने ही नहीं यह भी निर्माण के वक्त यह भी ध्यान में रखा जाता था कि घर केभीतर खाना खाने वक्त किसी बाहरी की नजर न पड़े। न्यायमूर्ति बोबडे ने अपने फैसला में रामनुज संप्रदाय से जुड़े लोगों का जिक्र करते हुए कहा कि वह किसी गैर के समक्ष खाना-पीना नहीं करते। आज भी दक्षिण भारत में इस संप्रदाय के लोग इस प्रथा का पालन कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा कि वहीं इस्लाम धर्म में दूसरों के घरों में झांकने पर सख्त पाबंदी है। जबकि इसाई धर्म में बात करते हुए उन्होंने कहा कि बाइबल में लोगों को दूसरों के कामकाज में दखल दिए बिना जीवन व्यतीत करने की बात कही गई है। उन्होंने कहा है कि धार्मिक और समाजिक रीतियों में निजता को हमारे कानून में पहचान दी गई है। सिविल प्रोसिजर कोड में पर्दानसीं महिलाओं को अदालत में पेश होने से छूट मिली हुई है। 

न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा कि स्वतंत्रता केलिए निजता होना जरूरी है। निजता का अधिकार ही लोगों को अपने मनमुताबिक काम करने का अधिकार देते हैं। न्यायमूर्ति बोबडे ने यह भी कहा कि सार्वजनिक जगहों पर भी निजता खत्म नहीं होती है। होटल या सिनेमाघरों में जहां हर व्यक्ति केलिए अपनी-अपनी जगह होती है, वहां भी निजता का सम्मान होना चाहिए।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें