जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग में आते बदलावों से परागण (पोलिनेशन) कीटों में 61.1 फीसदी की गिरावट आई है। इसकी वजह से आम, तरबूज, कॉफी और कोको जैसी उष्णकटिबंधीय फसलों के लिए भारी खतरा पैदा हो गया है।
लंदन यूनिवर्सिटी और नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के शोधकर्ताओं के अनुसार, कुल उत्पादन के संदर्भ इसका सबसे ज्यादा खतरा चीन, भारत, इंडोनेशिया, ब्राजील और फिलीपीन में पैदावार को है।
परागण कीटों में कमी से भारत में आम उत्पादन को विशेष रूप से खतरा है, जबकि इसके बाद चीन में तरबूज की पैदावार बुरी तरह प्रभावित हो रही है। वहीं, अफ्रीका में कोको उत्पादन पर जोखिम सबसे ज्यादा है। कोको उत्पादन वैश्विक स्तर पर करीब पांच करोड़ लोगों की आय का साधन हैं।
विश्व के 1,507 क्षेत्रों से जुटाए आंकड़े
शोधकर्ताओं ने वैश्विक स्तर पर 1,507 क्षेत्रों से फसलों और कीटों से जुड़े आंकड़े जुटाए। परागण करने वाले कीटों की 3,080 प्रजातियों की पहचान की गई है। अध्ययन में शोधकर्ताओं को जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और भूमि उपयोग में आ रहे बदलावों के कारण परागण करने वाले जीवों की विविधता पर पड़ रहे जटिल प्रभावों और उनके अंतरसंबंधों का पता चला है।
उर्वरक व कीटनाशक जिम्मेदार
कीटों में गिरावट के लिए मुख्य रूप से उनके निवास स्थान के हो रहे विनाश, भूमि उपयोग में बदलाव, उर्वरक और कीटनाशकों का बेतहाशा उपयोग जैसे कारणों को जिम्मेदार माना गया है। शोध के अनुसार, करीब 75 फीसदी फसलें कुछ हद तक परागण पर निर्भर करती हैं। अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं।
200 करोड़ छोटे किसानों पर असर
शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि इन परागणक कीटों से मिल रही सेवाओं के अंतरराष्ट्रीय सालाना मूल्य को आंकें तो वह करीब 29.5 लाख करोड़ रुपये बैठता है। वहीं, दुनियाभर में करीब 200 करोड़ छोटे किसानों के लिए ये मददगार हैं।
बंगलूरू स्थित नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज के वैज्ञानिकों ने अलग-अलग क्षेत्रों में जाइंट एशियन मधुमक्खी पर वायु प्रदूषण स्तरों के प्रभाव का आकलन किया। इसमें पाया गया कि परागण कीटों की आबादी लगातार कम हो रही है।