भारत में 19वीं शताब्दी के राजनीतिक विमर्श में राजनीतिक मुद्दों के बजाय सामाजिक मुद्दों पर जोर था। वर्ष 1927 से ही देश में भारत की स्वतंत्रता के बारे में गहन विचार-विमर्श होने लगा था। भविष्य में भारत को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखने वाले बाल गंगाधर तिलक थे, जिन्होंने कहा था, ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ वह भारतीय समाज की अनेक गड़बड़ियों और विरोधाभासों से अवगत थे, इसके बावजूद उन्होंने देश की आजादी को पहला लक्ष्य माना और कहा कि सामाजिक बुराइयों को दूर करने का काम आजादी के बाद भी हो सकता है।
वर्ष 1927 तक कांग्रेस नेतृत्व में अंग्रेजों से औपनिवेशिक स्वराज्य (डोमिनियन स्टेटस) की मांग पर आम सहमति थी। यानी वे चाहते थे कि आंतरिक मामलों में भारतीयों को स्वशासन का अधिकार दिया जाए, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका को प्राप्त था।
वर्ष 1928 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने स्वशासन के मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व में व्याप्त सर्वसम्मति पर सवाल उठाते हुए देश की स्वतंत्रता पर जोर दिया। सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे युवा नेताओं ने औपनिवेशिक स्वराज्य को साम्राज्यवाद की निशानी मानते हुए खारिज कर दिया। नेहरू ने 1927 में यूरोप और तत्कालीन सोवियत संघ के व्यापक दौरे के बाद औपनिवेशिक शोषण के बारे में स्पष्टता से अपने विचार रखे थे। ब्रुसेल्स में उन्होंने उपनिवेश-विरोधी एक बैठक में भाग लिया, जिसमें लैटिन अमेरिका, एशिया और अफ्रीका से प्रतिनिधि आए थे। सोवियत संघ ने उन्हें बेहद प्रभावित किया, जहां असमानता का नामोनिशान नहीं था। गांधी जी इस बदलाव को गौर से देख रहे थे।
उन्होंने नई पीढ़ी में वाम रुझानों और खासकर महाराष्ट्र में (गुजरात तब बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था) वस्त्रोद्योग के कामगारों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी के बढ़ते असर को देखा। नई विचारधाराओं को कांग्रेस में समाहित करने के लिए गांधी जी ने नेहरू को नया अध्यक्ष मनोनीत किया। उसी दौरान साइमन कमीशन (1927) का कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा उदारवादियों-सब ने विरोध किया, क्योंकि उसमें एक भी भारतीय प्रतिनिधि नहीं था और न ही इसमें भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य देने का वादा था। दिलचस्प यह है कि नेहरू रिपोर्ट (1928) में भी पूर्ण स्वतंत्रता के बजाय औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग की गई थी। महात्मा की रणनीति काम आई।
लेकिन भगत सिंह और उनके साथियों की नायकोचित वीरता से देश में एक अप्रत्याशित मोड़ आया। 31 दिसंबर, 1929-1 जनवरी, 1930 को लाहौर में नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का फैसला किया। यह प्रस्ताव गांधी जी द्वारा तैयार और पारित किया गया। इसमें बताया गया था कि ब्रिटिश राज ने भारत को आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से कितना नुकसान पहुंचाया है। पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य के साथ पहली बार 26 जनवरी को मनाया गया गणतंत्र दिवस बेहद सफल रहा था।