गणतंत्र को 1950 से लेकर अब तक 67 साल हो गए। जहां तक देश का सवाल है तो उसने दुनिया के सामने खुद को साबित कर दिया है कि उसकी अपनी साख है, उसकी अपनी समझ है, इसलिए दुस्तान आज दुनिया की जो अहम शक्तियां हैं, उनमें से एक माना जाता है। जहां तक देश का सवाल है तो अभी भी हमारे सामने तमाम चुनौतियां हैं। आबादी के हिसाब से हमारा देश कम से कम 15-20 देशों का एक समूह नजर आता है। जहां उत्तर प्रदेश की आबादी ब्राजील के बराबर है, तो उसी उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 750 डॉलर है, जबकि ब्राजील की प्रति व्यक्ति आय 12 हजार डॉलर से ज्यादा है। अगर हम समृद्ध राज्यों की बात करें, तो तमिलनाडु की आबादी फ्रांस के बराबर है, लेकिन फ्रांस की तुलना में यहां पर जो विकास है वो उतना ज्यादा नहीं है, जबकि तमिलनाडु भारत के विकसित राज्यों में गिना जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि गणतंत्र बनने के बाद सरकारों ने हमारी अर्थव्यवस्था को कमजोर मानकर नियंत्रित करके चलाया, क्योंकि उस समय चुनौतियां बहुत ज्यादा थीं। 1933 की जनगणना को देखें, तो हिंदुस्तान में प्रति व्यक्ति औसत आयु 33 वर्ष हुआ करती थी। उसके बाद उपनिवेश हट गया, हिंदुस्तान आजाद हो गया।
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आजाद होने के बाद भारत उस हिसाब से तरक्की नहीं कर पाया, जिस हिसाब से दुनिया के छोटे-छोटे मुल्क तरक्की कर गए। इनमें दक्षिण कोरिया, जापान, मलेशिया, इंडोनेशिया, स्कैंडेनेवियाई क्षेत्र के देश हैं। इनके साथ ही तमाम और छोटे-छोटे देश हैं। चूंकि पूंजी कुछ ही हाथों में सीमित रही, सरकार की कोशिश रही कि वो गरीब लोगों को राहत दें। उनके आगे बढ़ने के लिए मापदंड और सहायक कदम उठाए। हालांकि ऐसा नहीं हो पाया।
1991 में देश की अर्थव्यवस्था खुलने के बाद देश के विकास में तेजी आई। वो इस कारण से कि हिंदुस्तानियों को आगे बढ़ने के लिए अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिला। 1991 और आज की तारीख में 40 करोड़ हिंदुस्तानी गरीबी रेखा से ऊपर उठे हैं। इसमें एक बड़ा हाथ उद्यमों का था, श्रम का था और आजाद बाजार की शक्तियों का था, लेकिन अभी भी हमारे सामने बहुत बड़ी चुनौतियां हैं।
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अभी भी हिंदुस्तान में 40 प्रतिशत लोग पूर्णतया शिक्षित नहीं हैं। देश में प्रति व्यक्ति आय विकासशील देशों के बराबर है, विकसित देशों के बराबर नहीं। क्योंकि हिंदुस्तान का विकास एक सा नहीं हुआ है। उत्तर और पूर्व के छह-सात राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, असम और मध्य प्रदेश को मिलाकर देखें, तो इसमें प्रति व्यक्ति औसत आय किसी अफ्रीकी मुल्क के बराबर है। इसे आगे बढ़ाने के लिए तमाम नए उपायों की जरूरत है। इन राज्यों में शिक्षा की कमी है, निजी पूंजी की कमी है, लेकिन प्रतिभा की कमी नहीं है। हालांकि ऐसे उपायों की कमी है जिनसे टैलेंट अपने आपको आगे बढ़ा सकता है।
भारत के पिछड़ेपन के लिए जाति व्यवस्था भी जिम्मेदार
फाइल फोटो
- फोटो : Getty Images
हिंदुस्तान एक ऐसा बड़ा मुल्क है जिसने अपने इतिहास में कभी भी उपनिवेशवाद को बढ़ावा नहीं दिया। कभी दूसरे मुल्कों पर राज नहीं किया। कभी दूसरे मुल्कों का शोषण नहीं किया, क्योंकि नैसर्गिक आर्थिक समृद्धि को हासिल करने के लिए बल प्रयोग नहीं किया, लेकिन हिंदुस्तान में एक उपनिवेश देश के अंदर ही बन गया है और उसमें जाति व्यवस्था का एक बड़ा हाथ है।
अब तब जाति व्यवस्था में जो उच्च जाति के समझे जाते रहे हैं, वो इस मुल्क की सभी आर्थिक संपत्तियों का लाभ उठाते रहे हैं। 1990 के बाद पिछड़ी, एससी, एसटी जातियों का मुख्यधारा में प्रवेश हुआ। इसका असर अब दिखाई देता है कि मुंबई शहर में तीस फीसदी लोग उत्तर प्रदेश और बिहार से हैं, जोकि उस शहर को चलाते हैं। राजधानी दिल्ली में भी कमोबेश इतने ही लोग हैं, जो शहर के नेटवर्क को चलाने में मदद करते हैं। भारत को इस आंतरिक उपनिवेशवाद से आजादी चाहिए।
जब तक हिंदुस्तान में हम सभी जातियों, धर्मों और सभी क्षेत्रों के लोगों को अवसर नहीं देते कि वो अपनी जिंदगी अपने हाथ चला सकें। तब तक हिंदुस्तान का अपने
पूरे स्वरुप में विकसित होना असंभव दिखाई देता है। ऐसी शक्तियां अब भी मौजूद हैं जो अलग-अलग तबकों और हलकों को अलग करके देखती हैं, उनको उपनिवेश की नजर से देखती हैं। चाहे वो छत्तीसगढ़, ओड़िशा और झारखंड के वो इलाके हो, जहां खनिज व्यवसाय मिलता है। वो चाहते हैं कि उसकी हिस्सेदारी वहां रहने वाले लोगों को न मिले, जब तक ऐसा होता रहेगा हिंदुस्तान तरक्की नहीं कर सकता।
इस समय हमारे मुल्क में 6 फीसदी बेरोजगारी की दर है, जोकि पिछले दिनों में बढ़ गई, लेकिन बेरोजगारी तभी मिटेगी जब हम देश के खेती से जुड़े हुए इलाकों को नए अवसर प्रदान करेंगे। हमारे मुल्क की अर्थव्यवस्था इस समय देखी जाए, तो उसमें कोई 17 फीसदी विनिर्माण क्षेत्र का होता है, 17 फीसदी ही कृषि का भी योगदान होता है। एक बड़ा तबका जो है वो सेवा क्षेत्र का होता है, जोकि लगभग 66 फीसदी के आसपास होता है।
2022 में अमेरिका के बराबर होगी बेरोजगारों की संख्या
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दूसरी नजर से देखें, तो 70 फीसदी लोग अपना रोजगार कृषि में पाते हैं, जिसका हिस्सा सिर्फ 17 फीसदी है। जब तक हम समस्या को सुलझा नहीं लेते कि कृषि क्षेत्र में रोजगार पाने वालों को उद्योग या सेवा क्षेत्र में शिफ्ट कर सके तब तक हमारे देश के सामने रोजगार एक बड़ी समस्या रहेगी।
साल 2012 से 2022 के बीच में हमें हर महीने 1 करोड़ रोजगार पैदा करने का अवसर मिला था। ये हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। क्योंकि 2022 में देश में 83 करोड़ लोग होंगे, जिन्हें रोजगार चाहिए होगा। इनमें से केवल 50 करोड़ लोगों को हम रोजगार उपलब्ध करा पाए हैं। अगर 33 करोड़ लोग 2022 में बेरोजगार होते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि ये आंकड़ा अमेरिका की पूरी आबादी के बराबर है।
कोई भी मुल्क इतनी बड़ी संख्या में बेरोजगारों के साथ नहीं चल सकता और इसका असर बाकी चीजों पर भी देखा जाता है। हिंदुस्तान में कहा जाता है कि पुलिस एक जाति या लोगों के लिए उतनी ही तेजी से काम नहीं करती, जितनी दूसरे इलाके और जाति के लोगों के लिए काम करती है। शहरों में हमें तमाम व्यवसाय देखने को मिलता है, लेकिन गांवों में हालात बदतर होते जा रहे हैं।
जनतंत्र में कहा जाता है कि लोगों के लिए, लोगों के द्वारा, लोगों का... वो जो गणतंत्र कि असली मिसाल है उसे जब तक हम लागू नहीं करते कि सबको एक जैसी सुरक्षा, एक जैसे रोजगार के अवसर और एक जैसी शिक्षा, स्वास्थ्य के मौके नहीं मिलते हैं। गणतंत्र के 70 साल बाद भी ये अभी भी हमारे सामने बड़ी चुनौती है, जिसे सरकारें अपने दम पर पूरी कर पाएं या न कर पाएं, लेकिन हिंदुस्तान की जनता में वो शक्ति है कि वो गणतंत्र को वास्तव में जन गणतंत्र बनाने की शक्ति रखता है।