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Report: भारत में 51 फीसदी बच्चे जलवायु आपदा-गरीबी के दोहरे खतरे का सामना करते हैं, रिपोर्ट में किया गया दावा

Wed, 26 Oct 2022 09:18 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि भारत में 351.9 मिलियन बच्चे साल में कम से कम एक बार जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। वहीं, विश्व स्तर पर 774 मिलियन बच्चे इस उच्च जोखिम वाले समूह में आते हैं।
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भुखमरी - फोटो : pixabay
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विस्तार
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भारत में करीब 51 प्रतिशत बच्चे गरीबी और जलवायु आपातकाल के दोहरे प्रभावों में जी रहे हैं। बाल अधिकार एनजीओ सेव द चिल्ड्रन और व्रीजे यूनिवर्सिटिट ब्रुसेल के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में इस बात का दावा किया गया है। इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि भारत में 222 मिलियन सहित पूरे एशिया में लगभग 350 मिलियन बच्चे हैं, जो गरीबी और जलवायु आपदा दोनों की चपेट में हैं। 

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 'Generation Hope: 2.4 Billion Reasons To End The Global Climate And Inequality Crisis' नामक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे एशियाई देश जहां इस दोहरे खतरों का सामना करने की संभावना सबसे ऊपर है, की सूची में कंबोडिया सबसे ऊपर है। कंबोडिया में 72 प्रतिशत  बच्चे इस दोहरे खतरे से प्रभावित हैं। इसके बाद म्यांमार (64 प्रतिशत) और अफगानिस्तान (57 प्रतिशत) का स्थान है। हालांकि, गरीबी और जलवायु आपदा के इस "दोहरे खतरे" का सामना कर रहे बच्चों की कुल संख्या के मामले में भारत को विश्व स्तर पर सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

बाल अधिकार एनजीओ सेव द चिल्ड्रन और व्रीजे यूनिवर्सिटिट ब्रुसेल के शोधकर्ताओं द्वारा जलवायु मॉडलिंग के आधार पर विकसित की गई इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि भारत में 351.9 मिलियन बच्चे साल में कम से कम एक बार जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। वहीं, विश्व स्तर पर 774 मिलियन बच्चे इस उच्च जोखिम वाले समूह में आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उच्च आय वाले देश इस दोहरे खतरे से अछूते नहीं हैं।
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इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जलवायु आपदा और गरीबी दोनों का सामना कर रहे 121 मिलियन बच्चे उच्च आय वाले देशों में रहते हैं। इतना ही नहीं, इन दोनों कारणों से प्रभावित 10 मे से चार बच्चे अमेरिका या यूके में रहते हैं। 

इस स्थिति को लेकर बाल अधिकार एनजीओ सेव द चिल्ड्रन ने चेतावनी दी है कि यदि जलवायु और असमानता के संकटों का तत्काल समाधान नहीं किया गया, तो जीवन यापन संकट की लागत बढ़ना तय है।
भारत में बच्चों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुदर्शन सुची ने कहा जलवायु आपातकाल और असमानता के मुद्दे गहराई से जुड़े हुए हैं, और इन्हें एक दूसरे से अलग-थलग करके नहीं निपटा जा सकता है। भारत में, यह संबंध अब और स्पष्ट नहीं हो सकता है। असम, केरल और चक्रवात प्रवण ओडिशा में हमने जो विनाशकारी बाढ़ देखी है, उसने हाशिए के समुदायों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, जिससे हजारों लोग भूखे और बेघर हो गए हैं। इस तरह के संकट लोगों को और भी गरीबी में धकेल देते हैं और लाखों लोगों को और भी अधिक असुरक्षित बना देते हैं। 

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