अनुच्छेद-370 मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के बाद साबित हो गया कि जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की नीति गलत और महाराजा हरि सिंह व श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सोच सही थी। विलय के बाद राज्य को विशेष दर्जा देने, संयुक्त राष्ट्र में जनमत संग्रह की बात मान कर नेहरू ने बड़ी गलती की। 370 ने न सिर्फ राज्य में अलगाववाद की भावना को मजबूत किया, बल्कि इससे उपजे आतंकवाद की कीमत राज्य में अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों ने नरसंहार और अपना सबकुछ खोकर चुकाई।
दरअसल, मुखर्जी का मानना था कि जम्मू-कश्मीर सांस्कृतिक व ऐतिहासिक दृष्टि से भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में दूसरे रियासतों के भारत में विलय में जो प्रक्रिया अपनाई गई, जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में भी उसी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। हालांकि तब नेहरू ने अलग रास्ता अपनाते हुए राज्य के लिए अलग संविधान, अलग झंडे के साथ कई अन्य ऐसी शर्तें स्वीकार की, जिसने अंतत: राज्य में अलगाववाद को ही बढ़ावा दिया। इस अलगाववाद ने एकता को बहुत चोट पहुंचाई।
अब्दुल्ला-नेहरू प्रेम बना देरी का कारण
भाजपा का मानना है, आजादी के तत्काल बाद ही जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हो जाता। हालांकि तब नेहरू ने हरि सिंह के सामने शेख अब्दुल्ला की रिहाई और उन्हें सत्ता सौंपने की शर्त पर ही विलय के प्रस्ताव को मंजूर करने की शर्त रखी। नेहरू अपनी इस शर्त पर तब भी कायम रहे, जब पाकिस्तानी सेना कबीलाइयों के वेश में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर गई। अब्दुल्ला को सत्ता सौंपने की शर्त पूरी होने तक पाकिस्तान की सेना राज्य के एक बड़े हिस्से में प्रवेश कर चुकी थी।
जानकारों के मुताबिक विलय के बाद भी नेहरू ने अगर सेना को आजादी दी होती। संघर्ष विराम नहीं किया होता, तो भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना को राज्य के बाहर खदेड़ देती। हालांकि नेहरू ने अचानक युद्ध विराम की घोषणा की। इसके कारण पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) बना। पाकिस्तान ने कूटनीतिक चाल चलते हुए इसका बड़ा भूभाग शक्तिशाली चीन को दे दिया।
विलय के बाद हाशिये पर हरि सिंह
विलय के बाद हरि सिंह किनारे कर दिए गए। जानकारों के अनुसार, शेख अब्दुल्ला ने 1951 के राज्य के संविधान सभा के चुनाव में गड़बड़ी कर प्रजा परिषद पार्टी के उम्मीदवारों का नामांकन रद्द करा सभी सीटों पर अपनी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस की जीत सुनिश्चित की। इसके बाद भारतीय संविधान को नहीं मानने, राज्य का अलग संविधान, अपना झंडा और अलग प्रधानमंत्री होने का प्रावधान किया।
1953 में ही निरस्त हो जाता 370
मुखर्जी की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत के बाद अनुच्छेद-370 खत्म करने का फिर बड़ा अवसर था। इस पर बने दबाव के बीच अब्दुल्ला पाकिस्तान जाने पर अड़ गए। उन्हें 1953 में गिरफ्तार किया गया। तब राज्य में कुछ परिवर्तन किए गए, मगर अनुच्छेद 370 को खत्म करना जरूरी नहीं समझा गया।