केंद्र सरकार में विभिन्न कर्मचारी संगठन, आठवें वेतन आयोग की कमेटी के समक्ष अपने-अपने प्रतिवेदन रख रहे हैं। तकरीबन सभी कर्मचारी संगठन, 'पुरानी पेंशन बहाली' पर जोर दे रहे हैं। ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (एआईडीईएफ) ने भी 8वें केंद्रीय वेतन आयोग को सौंपी अपनी विस्तृत रिपोर्ट में कई तरह के सुझाव दिए हैं। एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार बताते हैं, आठवें वेतन आयोग से यह मांग की गई है कि वह कॉन्ट्रिब्यूटरी 'नेशनल पेंशन सिस्टम' को हटाने और एक जनवरी 2004 या उसके बाद भर्ती हुए केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सीसीएस पेंशन नियमों के तहत तय और गारंटीड पेंशन व्यवस्था को फिर से लागू करने की सिफारिश करे।
मार्केट-लिंक्ड रिटर्न पर सुरक्षा नहीं
बतौर श्रीकुमार, एआईडीईएफ ने आयोग को यह तर्क दिया है कि कर्मियों की रिटायरमेंट के बाद उनकी सुरक्षा मुख्य रूप से मार्केट-लिंक्ड रिटर्न पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। जो सरकारी कर्मचारी, एनपीएस के दायरे में हैं, उन्हें रिटायरमेंट के बाद अपनी आय की पर्याप्तता को लेकर काफी अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। आठवें आयोग को ओपीएस दोबारा से लागू करने के साथ-साथ न्यूनतम वेतन और फिटमेंट फैक्टर को भी अपनी सिफारिशों में शामिल करना चाहिए। मौजूदा समय में बढ़ती महंगाई और भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और परिवहन जैसी जरूरी सेवाओं की बढ़ती लागत के बीच यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
बुढ़ापे में सामाजिक सुरक्षा का जरिया है पेंशन
एआईडीईएफ महासचिव ने मार्केट से जुड़ी रिटायरमेंट सिक्योरिटी पर सवाल उठाए हैं। एनपीएस कर्मचारियों को मार्केट में उतार-चढ़ाव और महंगाई का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनका रिटायरमेंट फंड जमा किए गए कॉन्ट्रिब्यूशन और इन्वेस्टमेंट से मिलने वाले रिटर्न पर निर्भर करता है। एआईडीईएफ का तर्क है कि अगर महंगाई ज़्यादा रहती है, तो रिटायरमेंट फंड की नॉमिनल वैल्यू बढ़ने के बावजूद रिटायरमेंट के बाद उतनी खरीद-क्षमता (परचेजिंग पावर) नहीं मिल सकती। ऐसे में 8वें वेतन आयोग से आग्रह किया गया है कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों का आकलन इस आधार पर हो कि कोई कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद असल में कितनी इनकम और जीवन-स्तर बनाए रख सकते हैं। फेडरेशन ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया है, जिनमें कहा गया है कि पेंशन एक तरह का 'डेफर्ड रेम्यूनरेशन' (बाद में मिलने वाला वेतन) है और बुढ़ापे में सामाजिक सुरक्षा देता है।
यूपीएस के पक्ष में नहीं कर्मचारी
ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन, ने केंद्र सरकार की पेंशन स्कीम 'यूपीएस' का भी विरोध किया है। श्रीकुमार ने बताया कि सरकारी कर्मचारी एनपीएस के पक्ष में नहीं हैं। यही वजह है कि लंबे समय के बाद भी चार पांच फीसदी कर्मियों ने भी यूनिफाइड पेंशन स्कीम को विकल्प के तौर पर नहीं चुना। बता दें कि ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन, यूपीएस की घोषणा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल नहीं हुआ था। नेशनल काउंसिल की स्टैंडिंग कमेटी में फेडरेशन का प्रतिनिधित्व करने वाले श्रीकुमार ने कथित तौर पर एक अलग नोट सौंपा था। उसमें 'ओपीएस' को फिर से लागू करने की मांग की गई थी। आयोग से आग्रह किया गया है कि वेतन और रिटायरमेंट लाभों की समीक्षा करते समय, वह नौकरी कर रहे कर्मचारियों और पेंशनभोगियों, दोनों के सामने मौजूद आर्थिक दबावों पर विचार करे।
वित्त मंत्रालय के पास पहुंची पेंशनरों की फाइल
पिछले दिनों डीओपीटी ने पेंशनरों के हितों के मद्देनजर आठवें वेतन आयोग की संदर्भ शर्तों में संशोधन के लिए वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के पास फाइल भेजी है। अब व्यय विभाग तय करेगा कि आठवें वेतन आयोग की संदर्भ शर्तों में पेंशनरों को शामिल किया जाए या नहीं। एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने बताया, डीओपीटी ने सूचित किया है कि उनका प्रतिवेदन व्यय विभाग के पास भेजा गया है। कर्मचारी संगठन लगातार इस मांग को उठा रहे हैं कि 8वें वेतन आयोग के टीओआर यानी संदर्भ शर्तों में संशोधन किया जाए। इस संशोधन के जरिए पहली जनवरी 2026 से पहले के पेंशनभोगियों के लिए पेंशन के संशोधन को स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया जा सकता है।
1985 में हुआ संदर्भ शर्तों में संशोधन
कर्मचारी संगठनों ने सरकार से आग्रह किया है कि वेतन आयोग की संदर्भ शर्तों में पहले भी संशोधन किया गया है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। साल 1985 में वित्त मंत्रालय ने चौथे केंद्रीय वेतन आयोग की संदर्भ शर्तों में संशोधन करने के लिए बाकायदा राजपत्र में अधिसूचना जारी की थी। उस वक्त की आर्थिक स्थितियों और तुलनात्मक सेवानिवृत्ति लाभों को ध्यान में रखते हुए 'पूर्व और भविष्य दोनों प्रकार के पेंशनभोगियों के लिए एक उचित पेंशन संरचना' की जांच एवं सिफारिश करने के लिए कहा गया था। 'कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स' ने आठवें वेतन आयोग की 'संदर्भ की शर्तों' (टीओआर) में बदलाव की मांग को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखा था। पीएम से गुहार की गई कि 'पेंशनभोगियों' और उनके परिवारों के लिए पेंशन संशोधन को आठवें वेतन आयोग की संदर्भ शर्तों में शामिल किया जाए। साथ ही संदर्भ शर्तों से गैर-अंशदायी पेंशन योजनाओं की 'अवित्तपोषित लागत', इन शब्दों को हटाने की मांग की गई।
बुढ़ापे में उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ा जाएगा
श्रीकुमार के मुताबिक, पेंशन एक सामाजिक कल्याणकारी उपाय है जो कर्मचारियों को सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करता है। यह आश्वासन देता है कि बुढ़ापे में उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ा जाएगा, जिससे यह एक संवैधानिक दायित्व बन जाता है। एक आदर्श नियोक्ता के रूप में, भारत सरकार का अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों की गरिमा और कल्याण को बनाए रखना नैतिक और कानूनी दायित्व है। यह समझना ज़रूरी है कि जब पेंशन वैध हो और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी पुष्टि की गई हो, तो 'पेंशनभोगी' शब्द को विषय-वस्तु की सूची से हटाना असंगत है। ऐसे में 'गैर-अंशदायी पेंशन योजना की अवित्तपोषित लागत' केंद्र सरकार के पेंशनभोगियों पर लागू नहीं होती, क्योंकि केंद्र सरकार एक आदर्श नियोक्ता है।