जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ते तापमान का असर इतना गहरा गया है कि हर साल काम के दौरान औसतन 240 करोड़ श्रमिक भीषण गर्मी का सामना करने को मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की नई रिपोर्ट इंश्योरिंग सेफ्टी एंड हेल्थ एट वर्क इन चेंजिंग क्लाइमेट में यह जानकारी दी गई है। संयुक्त राष्ट्र ने इस रिपोर्ट में दुनियाभर के श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के पड़ते प्रभावों को उजागर किया है।
दुनिया के 71 फीसदी श्रमिक या तो बढ़ते तापमान की वजह से गर्मी की मार झेल रहे हैं या उन्हें अपने काम के दौरान कभी न कभी इसका सामना करना पड़ेगा। 2010 में ऐसे श्रमिक 65.5 फीसदी थे। इस वृद्धि से साबित होता है कि वैश्विक स्तर पर बढ़ता तापमान पहले से कहीं ज्यादा मेहनतकश श्रमिकों को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, हर साल भीषण गर्मी से करीब 2.3 करोड़ श्रमिक काम के दौरान चोटिल होते हैं। 18,970 श्रमिकों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है। जो इन दुर्घटनाओं से बच जाते हैं उनमे से कई जीवनभर इन चोटों और उसके प्रभावों का दर्द झेलते हैं। कार्यस्थल पर लग रहीं इन चोटों से हर साल करीब 21 लाख विकलांगता समायोजित जीवन वर्षों की क्षति हो रही है, जिसकी भरपाई नामुमकिन है।
बढ़ रहीं बीमारियां
काम के दौरान गर्मी का तनाव स्वास्थ्य से जुड़े अन्य खतरों को भी बढ़ा रहा है, इनमें किडनी से जुड़ी बीमारियां प्रमुख हैं। गर्मी के तनाव ने 2.62 करोड़ श्रमिकों को किडनी से जुड़ी बीमारियों का मरीज बना दिया है। इसके अलावा कमजोरी, भटकाव और थकावट भी है। गंभीर मामलों में यह हीटस्ट्रोक का कारण बन जाती है।
मजबूत कानून बने
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने रिपोर्ट में सरकारों को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से निपटने के लिए अपने कानूनों को सशक्त करने पर जोर देने की बात कही है, ताकि श्रमिकों के हितों की रक्षा की जा सके। कुछ देशों में कानूनी तौर पर उन श्रमिकों की निगरानी पर जोर दिया जा रहा है जो काम के दौरान अक्सर गर्मी, धूप, वायु प्रदूषण व स्वास्थ्य से जुड़े अन्य खतरों के संपर्क में आते हैं। इसके बावजूद अभी भी देशों में इसको लेकर पर्याप्त कानूनों का आभाव है। जहां कानून हैं भी वहां इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।