संयुक्त किसान मोर्चा के नेता डॉ. आशीष मित्तल ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र ने अपने तीनों कृषि कानूनों के जरिए किसानों के आर्थिक सशक्तीकरण की बात कही थी। लेकिन पूरे देश के किसानों का मानना था कि इन कानूनों के जरिए किसानों का सशक्तीकरण संभव नहीं है। अब कृषि कानून वापस होने का रास्ता बना है, लेकिन किसानों का सशक्तीकरण कैसे होगा, उसे कर्ज और आत्महत्या के जाल से मुक्ति कैसे मिलेगी, इसका कोई समाधान नहीं हुआ है।
किसानों का मानना है कि सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना, और उसकी पूरी फसल की खरीद होना किसानों के आर्थिक सशक्तीकरण की राह खोल सकता है। सरकार को इस विकल्प को स्वीकार करना चाहिए, या तो उसे अपना मॉडल बताना चाहिए कि इस देश के किसानों का आर्थिक सशक्तीकरण करने के लिए उसके पास क्या मॉडल है? किसान नेताओं का कहना है कि उनका असली मुददा कृषि बिलों की वापसी नहीं, बल्कि किसानों को आर्थिक मजबूती देने का था।
चुनाव तक आंदोलन खींचना चाहता है विपक्ष
वहीं, भाजपा को इस मामले में राजनीति दिखाई पड़ रही है। पार्टी के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा कि पूरा देश देख रहा है कि प्रधानमंत्री ने किसानों की सबसे बड़ी मांग मान ली है और कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी है। लेकिन अब दूसरे मुद्दों को उछालकर किसानों को भड़काने की कोशिश की जा रही है। नेता के मुताबिक, यह विपक्ष की साजिश है और कोई भी बहाना बनाकर वह इस आंदोलन को पांच राज्यों के चुनाव तक खींचने की कोशिश कर रहा है जिससे इसका चुनावी लाभ लिया जा सके।
नेता के मुताबिक, केंद्र सरकार के कृषि कानून किसानों के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए ही थे, इससे उनकी आय को 2022 तक दोगुना किए जाने का प्रयास था, जिसका वादा भाजपा ने 2019 के आम चुनाव के दौरान किया था। लेकिन विपक्ष को इस बात का अंदेशा था कि यदि केंद्र सरकार इस योजना को पूरा कर देती है और किसानों की आय बढ़ जाती है तो इससे उनकी राजनीति हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। यही कारण है कि जानबूझकर किसानों को भड़काकर उनके ही विकास के रास्ते बंद कर दिए गए।
नेता ने कहा कि किसान आंदोलन को दिल्ली की बजाय अब उत्तर प्रदेश में बढ़ाने की कोशिश की जा रही है और इसका कारण बहुत साफ नजर आ रहा है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि पूरा देश इस घटनाक्रम को देख रहा है और इसका चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
किसानों ने आरोपों को गलत बताया
वहीं, किसान नेता डॉ. आशीष मित्तल ने कहा कि आंदोलन की शुरुआत से हम पर राजनीतिक होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन अब जब स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमें किसान समझकर तीनों कानूनों को वापस ले लिया है, अब केंद्र सरकार और भाजपा नेताओं को इस आंदोलन को राजनीति से प्रेरित नहीं बताना चाहिए। यह मुद्दा अब पीछे छूट चुका है। उन्होंने कहा कि हर आंदोलन से किसी को लाभ और किसी को नुकसान होता है। यदि भाजपा चाहती है कि इस आंदोलन का लाभ विपक्ष न ले तो उसे किसानों की बात मानकर इसका राजनीतिक लाभ लेना चाहिए।