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Imam Remuneration: इमामों को पारिश्रमिक संविधान का हनन, सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सूचना आयुक्त ने गलत बताया

Sat, 26 Nov 2022 12:42 PM IST
सुरेंद्र जोशी अमर उजाला ब्यूरो/एजेंसी, नई दिल्ली

सार

यह बात केंद्रीय सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने दिल्ली सरकार और दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा इमामों के वेतन विवरण की मांग करने वाली एक अर्जी के जवाब में कही। एक कार्यकर्ता द्वारा दायर आरटीआई अर्जी की सुनवाई करते हुए कहा कि यह आदेश संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है।

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केंद्रीय सूचना आयोग का लोगो (फाइल) - फोटो : CIC Official website
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विस्तार
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केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने मस्जिदों के इमामों को वेतन देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के 1993 के आदेश को संविधान का उल्लंघन बताया है। आयोग ने इसे गलत उदाहरण तय करने वाला फैसला बताते हुए कहा, इसके कारण अनावश्यक राजनीतिक रस्साकशी और सामाजिक असामंजस्य की स्थिति पैदा हुई।

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सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल की ओर से दाखिल आवेदन पर सुनवाई के बाद कहा, करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल किसी एक धर्म को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जा सकता। माहुरकर ने अपने आदेश की प्रति केंद्रीय कानून मंत्री को भेजने का निर्देश दिया, ताकि संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक का सही अर्थों में पालन सुनिश्चित हो सके।

सूचना आयुक्त ने इस आदेश में केंद्र और राज्यों से सरकारी धन के मामले में सभी धर्मों-संप्रदायों के पुरोहितों से एक जैसा बर्ताव करने के लिए कहा है। उन्होंने धार्मिक समानता के अन्य मामलों में भी यह फैसला लागू करने के लिए कहा है। माहुरकर दिल्ली सरकार व दिल्ली वक्फ बोर्ड से इमामों को भुगतान किए गए वेतन की विस्तृत जानकारी वाले आवेदन पर सुनवाई कर रहे थे। 
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यह है मामला : सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ बोर्ड को वेतन भुगतान करने को कहा था 
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन की ओर से दाखिल याचिका पर आदेश दिया था। इसमें वक्फ बोर्ड को उन मस्जिदों के इमामों को वेतन के भुगतान को कहा, जिनका प्रबंधन उसके हाथ में है। 
करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल किसी एक धर्म को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जा सकता। -उदय माहुरकर, सूचना आयुक्त 

सरकारी पैसे से वित्तीय लाभ की राह खुली, संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन 

  • सूचना आयुक्त माहुरकर ने आदेश में कहा, 13 मई,1993 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मस्जिदों के इमाम और मुअज्जिनों को सरकारी खजाने से वित्तीय लाभ पहुंचाने की राह खोल दी। 
  • आयोग का मानना है कि शीर्ष अदालत का फैसला संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन था।

इमामों को पारिश्रमिक देना अन्य धर्मों से विश्वासघात
सूचना आयुक्त ने फैसले में कहा, केवल मस्जिदों में इमामों व अन्य लोगों को पारिश्रमिक देना, न केवल हिंदू समुदाय और अन्य गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक धर्मों के सदस्यों के साथ विश्वासघात है।

इमामों को 18 हजार  पुजारी को दो हजार 
  • सूचना आयुक्त माहुरकर ने कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड को दिल्ली सरकार से लगभग 62 करोड़ रुपये का वार्षिक अनुदान मिलता है, जबकि स्वतंत्र स्रोतों से इसकी अपनी मासिक आय लगभग 30 लाख रुपये है। 
  • दिल्ली में वक्फ मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों को 18 हजार रुपये और 16 हजार रुपये का मासिक मानदेय वस्तुत: दिल्ली सरकार की ओर से करदाताओं के पैसे से दिया जा रहा है। इसके उलट एक हिंदू मंदिर के पुजारी को उक्त मंदिर को नियंत्रित करने वाले ट्रस्ट से प्रति माह सिर्फ दो हजार रुपये मिल रहे हैं।
अंतर धार्मिक सद्भाव फैसले से प्रभावित
महुरकर ने कहा, मुस्लिम समुदाय को धार्मिक लाभ देने जैसे कदम, जैसा कि वर्तमान मामले में उठाया गया है, वास्तव में, अंतर धार्मिक सद्भाव को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।

एक समुदाय को विशेष लाभ ने देश का किया विभाजन : सीआईसी 
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी ) ने कहा, 1947 से पहले मुस्लिम समुदाय को विशेष लाभ देने की नीति ने मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में विखंडन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया जो आखिरकार देश को विभाजन की ओर ले गई। इसलिए केवल मस्जिदों में इमामों व अन्य लोगों को पारिश्रमिक देना, न केवल हिंदू समुदाय और अन्य गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक धर्मों के सदस्यों के साथ विश्वासघात है, बल्कि भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग के बीच पैन-इस्लामवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देना है जो पहले से ही दिखाई दे रहा है। 

सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने कहा, जब सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को विशेष धार्मिक लाभ देने की बात आती है तो इतिहास को देखना जरूरी है। मुसलमानों के एक वर्ग की मांग के कारण भारत विभाजन के पश्चात इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान का जन्म हुआ था। पाकिस्तान के बावजूद, भारत ने सभी धर्मों के समान अधिकारों की गारंटी देने वाले संविधान को चुना। आरटीआई अधिनियम के तहत अपील और शिकायतों का फैसला करने वाली सर्वोच्च संस्था केंद्रीय सूचना आयोग के आदेशों को अक्सर रिट याचिकाओं के माध्यम से उच्च न्यायालयों में चुनौती दी जाती है।
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बहुसंख्यकों को भी सुरक्षा का अधिकार 
माहुरकर ने कहा, धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर इस तरह के कदमों को सही ठहराने से यह सवाल उठता है कि यदि किसी विशेष धार्मिक अल्पसंख्यक को सुरक्षा का अधिकार है, तो बहु-धार्मिक देश में बहुसंख्यक व अन्य समुदायों को भी सुरक्षा का यह अधिकार है। देश में सभी धर्मों के सदस्यों के अधिकारों को अंतर-विश्वास सद्भाव और राष्ट्र की एकता के हित में समान रूप से संरक्षित किया जाना अनिवार्य है। 

सूचना छिपाने का प्रयास किया वक्फ बोर्ड ने
आयोग ने कहा, दिल्ली वक्फ बोर्ड ने शुरू में आरटीआई आवेदन के जवाब में इमामों को वेतन देने की बात से इनकार किया था, लेकिन बाद में एक संशोधित जवाब में कहा कि यह केवल मानदेय है न कि वेतन। 
  • आयोग का मानना है कि शुरुआती दौर में शब्दों के खेल से सूचना को छिपाने का स्पष्ट प्रयास किया गया था। उसने दिल्ली वक्फ बोर्ड व दिल्ली के मुख्यमंत्री के कार्यालय को अग्रवाल के आरटीआई में मांगी गई जानकारी देने का आदेश दिया।
आरटीआई कार्यकर्ता को मुआवजा
आयोग ने दिल्ली वक्फ बोर्ड को आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल को 25 हजार रुपये मुआवजे का आदेश दिया। अग्रवाल को जानकारी हासिल करने में जो संसाधन व समय बर्बाद करना पड़ा उसके लिए यह मुआवजा दिया जाएगा।
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