बता दें कि सीआरपीएफ में कुल 248 बटालियन हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र, आतंकवाद ग्रस्त इलाके और नॉर्थ ईस्ट में उग्रवाद की समस्या, इन सभी स्थानों पर सीआरपीएफ की तैनाती है। इस बल ने उक्त इलाकों में सराहनीय कार्य किया है। इसके अलावा देश में कहीं भी दंगा हो, प्राकृतिक आपदा में लोगों की मदद या निष्पक्ष चुनाव कराना, इन सभी कार्यों में भी सीआरपीएफ की तैनाती रहती है। इसके चलते एक ग्रुप सेंटर के अंतर्गत आने वाली बटालियन, उस सेंटर से काफी दूरी तक पहुंच जाती है।
उदाहरण के तौर पर दिल्ली के ग्रुप सेंटर की बटालियन मणिपुर या असम में तैनात हो सकती है तो असम के ग्रुप सेंटर की बटालियन दिल्ली या जेएंडके में भेजी जा सकती है। ऐसी स्थिति में इन बटालियनों का पेरेंटल ग्रुप सेंटर बहुत दूर हो जाता है। इसके चलते जवानों की जरुरतें, मसलन हाउस कीपिंग, वेतन और भत्तों के बिल तैयार करना, सर्विस इंट्रेस्ट जैसे वर्दी, शूज, बिल्ले, चारपाई, कंबल व दूसरा सामान, आदि पूरी होने में देरी हो जाती है। बिल संबंधी औपचारिकताएं पूरी करने में भी समय लगता है। स्टोर मेनटेन करना भी आसान नहीं होता। इन सभी प्रक्रियाओं में अधिक समय और अतिरिक्त मैनपावर लगती है। खर्च भी बढ़ जाता है।
सीआरपीएफ के मुताबिक, 1968 में ग्रुप सेंटर की अवधारणा सामने आई थी। तब एक ग्रुप सेंटर पर तीन से चार बटालियन रहती थी। 2001 में इन बटालियनों की संख्या को बढ़ाकर पांच कर दिया गया। चूंकि बटालियन को तो एक तय अंतराल लगभग 'तीन वर्ष' बाद दूसरी जगह पर जाना पड़ता था। इस प्रक्रिया में बटालियन का सारा सामान भी दूसरे स्थान पर पहुंचाया जाता था। 2008-09 के आसपास में बटालियन का ये मूवमेंट बंद कर दिया गया। हालांकि विभिन्न ग्रुप सेंटरों से अटैच बटालियनों को देश के विभिन्न हिस्सों में तैनात किया जाता है।
किसी भी बटालियन का घोषित मुख्यालय 'डिक्लेयर्ड हेडक्वार्टर', उसका अपना ग्रुप सेंटर होता है। जैसे दिल्ली के ग्रुप सेंटर से अटैच कोई बटालियन, असम में भेज दी जाती है, इस स्थिति में उसका ग्रुप सेंटर दिल्ली ही रहेगा। बटालियन के जवानों से जुड़े सर्विस इंट्रेस्ट, दिल्ली वाला ग्रुप सेंटर ही देखता है। अब एक हजार किलोमीटर दूर तैनात किसी बटालियन को दस बारह चारपाई या टैंट की जरुरत है या वर्दी जूते चाहिएं तो वह पेरेंटल ग्रुप सेंटर से ही भेजे जाएंगे। इसके लिए अतिरिक्त मैनपावर लगानी पड़ेगी और पैसा भी खर्च होगा। ये सामान भिजवाने में समय अलग से लगेगा।
सीआरपीएफ में बटालियन के मूवमेंट को लेकर एक कमेटी का गठन किया गया था। उस कमेटी की सिफारिशों के आधार पर बटालियन का मूवमेंट बंद कर दिया गया। पहले आदमी और सामान, दोनों को ही शिफ्ट करना पड़ता था। बटालियन का मूवमेंट बंद होने के बाद पहले की भांति केवल जवानों का ही स्थानांतरण जारी रखा गया। अब नई व्यवस्था में किसी भी बटालियन को उसकी तैनाती के निकटवर्ती ग्रुप सेंटर के साथ अटैच कर दिया गया है। इनमें आरएएफ की बटालियन शामिल नहीं हैं। ये बटालियन अपना सारा काम खुद ही करती हैं।
बटालियनों को पुनः संगठित करने के बाद ग्रुप सेंटरों के वरिष्ठ अधिकारियों का सुपरविजन का कार्य बढ़ जाएगा। जैसे सीआरपीएफ के जोन पर अधिकारियों के प्रशासनिक नियंत्रण और परिचालन नियंत्रण का भार 41 से 74 प्रतिशत बढ़ जाएगा। इसी तरह से सेक्टर पर 19 से 41 प्रतिशत और रेंज पर भी प्रशासनिक एवं परिचालन नियंत्रण के भार में 10 से 35 प्रतिशत की वृद्धि होगी। मौजूदा समय में बटालियन में तैनात जवान, अपने परिवार को किसी भी ग्रुप सेंटर में रख सकते हैं। अब वे अपनी तैनाती के करीब वाले ग्रुप सेंटर पर अपना परिवार रख सकते हैं।