पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में भले ही मुख्य मुकाबला 15 साल से सत्ता में रही कांग्रेस और इसकी दावेदार के तौर पर उभरी भाजपा के बीच हो, लेकिन अबकी विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी निर्णायक रहने की उम्मीद है। कांग्रेस को जहां इस बार भी वोटरों का समर्थन हासिल करने की उम्मीद है, वहीं भाजपा ने कांग्रेस-मुक्त मणिपुर का नारा दिया है। इन चुनावों में क्षेत्रीय दल भी काफी सक्रिय हैं।
दो बार राज्य में सरकार का गठन करने वाली मणिपुर पीपुल्स पार्टी (एमपीपी) को बीते विधानसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन इस बार वह 60 में से 39 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का मन बना रही है। पार्टी को इस बार बेहतर प्रदर्शन का भरोसा है। मेघालय की विपक्षी पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) भी पहली बार 30 उम्मीदवारों के साथ यहां चुनाव मैदान में उतरेगी। लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष पीए संगमा की ओर से गठित इस पार्टी में प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति का भी गठन कर लिया है।
इनके अलावा चुनाव में जिस क्षेत्रीय पार्टी पर सबकी निगाहें टिकी हैं वह है मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला की पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस पार्टी यानी प्रजा। यह देखना दिलचस्प होगा कि आम लोग इस पार्टी को कितना समर्थन देते हैं। राज्य में 20 सीटें नगा बहुल पर्वतीय इलाके में हैं और 40 मणिपुर घाटी में।
नगा इलाकों में नगा पीपुल्स फ्रंट (अएनपीएफ) का दबदबा है। राज्य में सात नए जिलों के गठन के विरोध में नगा संगठनों की अपील पर बीते साल पहली नवंबर से जारी आर्थिक नाकेबंदी ने नगा और मैतेयी तबके के मतभेदों को बढ़ा दिया है। ऐसे में राज्य में नई सरकार के गठन में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बेहद अहम होगी।