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Kerala: अभिव्यक्ति की आजादी लेकिन निजता को हानि नहीं पहुंचा सकता है मीडिया, केरल हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

Fri, 08 Nov 2024 02:34 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोच्चि

सार

आपराधिक मामले में मीडिया के हस्तक्षेप को लेकर केरल हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। जहां अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मीडिया को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने लगे जबकि जांच पूरी नहीं हुई हो।
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सीलबंद लिफाफे में सौंपे हेमा समिति की रिपोर्ट- केरल सरकार को हाईकोर्ट का निर्देश - फोटो : ANI
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विस्तार
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आपराधिक मामले में मीडिया के हस्तक्षेप को लेकर केरल हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने गुरुवार को कहा कि मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह नागरिकों के सम्मान, प्रतिष्ठा और निजता के अधिकार को नुकसान पहुंचा सकती है खासकर जब आपराधिक जांच या अदालतों में लंबित मामलों की रिपोर्टिंग की जाती है।
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न्यायाधीशों की भूमिका ना निभाए मीडिया- कोर्ट
जानकारी के अनुसार यह फैसला पांच न्यायाधीशों की एक पीठ ने सुनाया, जिसमें यह कहा गया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मीडिया को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने लगे जबकि जांच पूरी नहीं हुई हो। पीठ ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया को जांच एजेंसियों, अभियोजकों और न्यायाधीशों की भूमिका निभाने का अधिकार नहीं है। इसके साथ ही न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नांबियार, कौसर एडप्पागथ, मोहम्मद नियास सीपी, सीएस सुधा और श्याम कुमार वीएम की पीठ ने एकमत से यह माना कि मीडिया की स्वतंत्रता न्याय व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का लाइसेंस नहीं है।

आपराधिक मुकदमे पर दिया जोर
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि आपराधिक मुकदमों के दौरान मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगाने से न्यायिक प्रक्रिया और अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि मीडिया को दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के तहत सीमित होनी चाहिए खासकर जब वह आपराधिक मामलों और जांचों पर रिपोर्ट करता है।
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अदालत की टिप्पणी
अदालत ने कहा कि आपराधिक जांच या कोर्ट में लंबित मामलों पर रिपोर्ट करते वक्त दोषी या निर्दोष होने का अंतिम निर्णय सिर्फ न्यायिक प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा ही किया जा सकता है। मीडिया को अपनी रिपोर्टिंग में सत्य और सटीक तथ्यों को ही शामिल करने का अधिकार है, लेकिन यदि मीडिया किसी मामले को गलत, अपमानजनक, विकृत या गैर-पेशेवर तरीके से प्रस्तुत करता है। इससे निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है या आरोपी या पीड़ित की प्रतिष्ठा और गोपनीयता को नुकसान पहुंच सकता है।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि मीडिया को यह समझना चाहिए कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए न्यायपालिका और जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किए बिना रिपोर्टिंग करें और यह सुनिश्चित करें कि मीडिया ट्रायल न हो। वहीं मीडिया ट्रायल, जो नैतिकता और निष्पक्षता की सीमाएं पार कर जाता है, संदिग्ध या आरोपी को बिना अदालत के फैसले के दोषी या निर्दोष के रूप में पेश कर देता है, यह संविधान के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।

मीडिया के पास निश्चित राय की अनुमति नहीं- कोर्ट
कोर्ट ने इस फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक जांच या निर्णय से जुड़े मामलों में मीडिया को किसी भी पक्ष के दोषी या निर्दोष होने पर कोई निश्चित राय व्यक्त करने की अनुमति नहीं है, जब तक कि संबंधित न्यायिक मंच आधिकारिक रूप से निर्णय नहीं देता। पीठ ने अंत में कहा कि इस प्रकार के फैसले से समाज में व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को रोकने में मदद मिलेगी और यह जिम्मेदार पत्रकारिता के एक नए युग की शुरुआत करेगा।
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